हमरे दुअरा पर चाँन अगराइल रे, बसंत रितु आइल रे !

जाड़ा-पाला से सिहरत-ठिठुरत चिरई-चुरुंग,धूर -धक्कड़ से सनल-पटल पेड़- रूख, उकठल -सुनसान खेत- सीवान अउर थकल -उदासल धरती क हरस-सरस के सिंगार करे आवेले बसन्त रितु। एह समय धरती -आकास सगरो उछाहे -उछाह देखाला।किसिम -किसिम क फूलन के सुगंध से फुलवारी मह-मह महक उठेले, बाग़-बगइचा बउरा उठेला। सरसों क पीयर सोनहुल रंग से खेत दमक उठेला। माने रितुवन में सबसे चटख, सबसे सुघर ,सबसे सुगन्धित ,सबसे मनभावन रंग ह रितुराज बसंत ।एह रितु में सगरो मनलुभावन, मोहन आनन्द देखे के मिल जाला। सांच पूछीं त इ आनन्द नवसृजन क ह,पतझड़ के…

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प्रेम -प्रेम सब कोई कहे ,प्रेम न चीन्हे कोई…..

साहित्य -सरिता क फरवरी अंक “प्रेम -विशेषांक ” ह। ग्यानी -ध्यानी पुरखा -पुरनिया प्रेम के अकथ -अबूझ कहले हउवन।सचहूं, कहाँ केहू गुन-गथ पउलस प्रेम के ? जे एह अबूझ के बूझ लिहलस ऊ परम आनंद में मगन,सुध -बुध बिसरवले मगन मन गावे -नाचे लगल आ दीन -दुनिया से बेखबर ‘चैतन्य ‘ हो गइल,’मीरा’ हो गइल।कबीर ,तुलसी ,रैदास हो गइल।पीर में मातल,नेह में भोरल ‘घनानंद’ हो गइल।केतना -केतना कहाइल, केतना गवाइल, केतना बखानल गइल बाकिर प्रेम क खिस्सा ,कहनी ,गीत,ओतने अजान, ओतने रहस्यमय,ओतने नया, ओतने पुरान आजो ह जेतना सृष्टि के…

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आपन बात

आभाषी दुनिया के मकड़जाल मे अझुराइल अदमी के लग्गे अपने भाषा के लेके केतना समय बा , एकर उत्तर खोजे के जरूरत नइखे । उत्तर सगरों छीटाइल बा , देखि समझी आउर बिचारी । ना जाने केतनी भोजपुरी के पत्र पतिरका कब शुरू भइनी स , आ कब बन्न हो गइनी स , केतना जाने के मालूम बा ? ओहमे एगो पतिरका इकाई के अंक से दहाई के अंक मे पहुँच रहल बा , सराहे जोग बा । जवन समाज अपने कर्मठता ला जानल जाला , आज उहे समाज आपन…

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आपन बात

आजू के भागमभाग दौर में भोजपुरी के पत्र-पत्रिका चलावल कवनो खेल ना ह. आज जब पठनीयता कम भइल जात बा आ लोग आभासी दुनिया में आकंठ डूबल जा रहल बा एह बीचे आपन उहे आभासी मंच पर उपस्थिति दर्ज करावल उहो, नियमित रूप से कवनो ठठ्ठा बात ना कहल जाई. ‘भोजपुरी साहित्य सरिता’ लगातार एह दिसाई आपन प्रासंगकिता बनवले बा. बहुत थोडके समय में बहुत साहित्यकार लोगन के एगो लमहर जमात खड़ा में जहवां उ सफल बा उहें रोज –ब- रोज नया कलमकार के देश-विदेश से खोजे में सफलो भइल…

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आपन बात

भोजपुरी साहित्य सरिता क इ अंक आप लोगन के सौंपत के बहुत हर्ष होत बा। सबसे बड़ी खुशी क इ बात ह कि ई अवसर कार्तिक महिना के बा । कउनो राष्ट्र देश के सांस्कृतिक वैभव क परिचायक उहवां के लोक साहित्य होखेला। जवने से उहवां के संस्कार परंपरा जीवन आदर्श उत्सव विषाद नायक नायिका रितु गीत विवाह गीत भजन राजनीतिक सामाजिक धार्मिक गीतन के बोल में समाहित रहेला। वइसे तो हर देश के आपन एक परम्परा होखेला लेकिन हमरे देश के बात निराला बा। इहवा “कोस -कोस पर बदलें…

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आपन बात

साहित्य के चउखट पर ठाढ़ ऊँट कवने करवट बइठ जाई , आज के जमाना मे बूझल तनि टेंढ ह । कब के टोनहिन नीयर भुनभुनाए लागी आ कब के टोटका मार के पराय जाई ,पते ना चले । आजु के जिनगी मे कवनों बात के ठीहा ठेकाना दमगर देखाई देही , भरोष से कहलों ना जा सके । एगो समय रहे जब मनई समूह मे रहत रहे , अलग समूह – अलग भाषा –बोली , रीत – नित सभे कुछ कबीला के हिसाब से रहे । ओह कबीलन मे अपने…

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