भाषा संस्कृति के नेह के संगे बेवस्था से विद्रोह के सुगबुगाहट – “भोर भिनुसार”

अपनी संस्कृति आपन संस्कार गाँव जवार के जिनगी , शहरी घुटन के बीच मे भोजपुरी के निठाह शब्दन के भरपूर परयोग के संगे “भोर – भिनुसार” कविता संग्रह संतोष कुमार जी के भाषाई नेह छोह अउरी ओह पर उनुके अधिकार क भरल – पूरल चित्रण बा । संतोष कुमार जी के भोजपुरी खाति नेह केहु से छिपल नइखे । उ साँचहुं मे भोजपुरी के जिएलन , इहो कहल अधिका ना होई कि उ भोजपुरिए मे साँसो लेलन । भोर भिनुसार कविता संग्रह उनुके एही गुण के प्रतिरूप बा । जहां…

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“पीपर के पतई” भोजपुरी सांस्कृतिक चेतना के काव्य संग्रह ह

जयशंकरप्रसाद द्विवेदी के काव्यसंग्रह- पीपर के पतई, के हम भोजपुरीसांस्कृतिक चेतना के संग्रह काहे कहले बानी, इ एही लेखा नइखे कहल गइल. एह संकलन में 65 गो कविता बाड़ी सन. भोजपुरी के आउर दूसर कवि लोगन लेखा द्विवेदी जी माई सुरसती के गोहरवले बानी, बाकिर दुसकरी कविता “अइसने घरवा”के पढ़ते कवि के भाव समझ में आ जात बा आखिर ओकरा कहे के का इरादा बा. भोजपुरी समाज में परिवार कइसे बिखरत बा एकर बानगी ह इ कविता – “तुनक के बबुआ मत बतियावा सभकर अइठन छूटल अइसने घरवा फुटल” देखल…

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बिला रहल थाती के संवारत एगो यथार्थ परक कविता संग्रह “खरकत जमीन बजरत आसमान “

मनईन के समाज आउर समय के चाल के संगे- संगे  कवि मन के भाव , पीड़ा , अवसाद आउर क्रोध के जब शब्दन मे बान्हेला , त उहे कविता बन जाला । आजु के समय मे जहवाँ दूनों बेरा के खइका जोगाड़ल पहाड़ भइल बा , उहवें साहित्य के रचल , उहो भोजपुरी साहित्य के ,बुझीं  लोहा के रहिला के दांते से तूरे के लमहर कोशिस बा । जवने भोजपुरी भाषा के तथाकथित बुद्धिजीवी लोग सुनल भा बोलल ना चाहेला , उहवें  भोजपुरी  के कवि / लेखक के देखल ,…

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ऑक्सीजन से भरपूर ‘पीपर के पतई’

कहल जाला कि प्रकृति सबके कुछ-ना-कुछ गुण देले आ जब ऊहे गुण धरम बन जाला त लोग खातिर आदर्श गढ़े लागेला। बात साहित्य के कइल जाव त ई धरम के बात अउरी साफ हो जाला। ‘स्वांतः सुखाय’ के अंतर में जबले साहित्यकार के साहित्य में लोक-कल्याण के भाव ना भरल रही, तबले ऊ साहित्य खाली कागज के गँठरी होला। बात ई बा कि अबहीने भोजपुरी कवि जयशंकर प्रसाद द्विवेदी जी के पहिलकी कविता के किताब ‘पीपर के पतई’ आइल ह। ई किताब कवि के पहिलकी प्रकाशित कृति बा बाकिर ऊहाँ…

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जिनगी के हर कोना के उकेरत कविता संग्रह “जिनगी रोटी ना हs”

आजु के जुग मे जहवाँ रिस्तन के जमीन खिसक रहल बा , अपनत्व के थाती बिला रहल बा ,उहवें एकरा के जीयब उहो जीवंतता के संगे , एगो मिशाल हs । जवने समय में मनई अपने माई भाषा के बोले मे शरम महसूस करत होखो , ओहि समय मे आपन  माई भाषा बोलल आउर ओहु से बढ़ी के ओह मे साहित्य रचल , एगो लमहर काम बाटे । उहवें कवि हृदय केशव मोहन पांडेय जी अपना के अपने माई भाषा खाति समर्पित कइले बानी । जवने के परिणिती बा इ…

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