बेगानी शादी मे अब्दुल्ला दीवाना

का जमाना आ गयो भाया , “बेगानी शादी मे अब्दुल्ला दीवाना” कूल्ही ओर फफाये लागल बाड़न सs। पतरी पर छोड़ल खइका खइला के बाद जइसे कुकुर अइठत चलेलन सs, ओइसही इहवों ढेर लोग चल रहल बाड़ें । का कहीं महाराज , दोकान – दउरी बन्न होए के अपसगुन देखाए लागल बा । फेर त “उपास भला कि पतोहू के जूठ” , जियल जरूरी बा त पतोहिया क जूठवों के साफ आ मीठ बुझही के परी नु । खइला के बाद पतोहिया के गोड़वों पुजही के परी नु । पुजाइयो रहल…

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साधो देखो जग बौराना

‘ ए गुरु ! सुनला ह न कन्हैया क भाषण,का बोललस पट्ठा जानदार, शानदार, जबरदस्त।एकदम तबियत हरियर हो गयल।ए साह जी एहि बात प एगो स्पेशल चाय पिआवा भाय।’ नन्हकू कन्हैया कुमार क भाषण सुनके बहुत खुश रहलन अउर चाहत रहलन कि सबही ओ खुशी में लवलीन हो जाय बाकिर केहू नन्हकू क मन क साध पूरा करे के तैयार ना रहे। ‘हमके त कुल भाषण में एक्के गो बतिया निम्मन लगल ए नन्हकू।’ एक जाना के बोलते नन्हकू हुलस के लहरे लगलन – ‘कवन हो चच्चा ,तनी सुनी ?’नन्हकू ए…

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होलिका फुंकले क का फायदा

‘ ए बचवा! एना पारी होलिका जी क मूर्तिया ना आई का हो।परसाल त एतना सु्ग्घर मूर्ती रहल कि देख के जियरा जुड़ा गयल।होलिका माता केतना सुग्घर लगत रहलीं। उनके गोदी में बइठल उनकर लाल क सोना नियन मुंह देख के अपने टीटुआ क याद आ गयल रहे।’ बेकहला फुआ कॉलोनी के मोड़ पर होलिका बदे लकड़ी सहिरावत लइकन से पूछत रहलिन कि नन्हकू बिच्चे में कूद गइलन- ‘ए फुआ होलिका कब ले माता हो गइलिन हो।जानत हऊ न कि ऊ के रहलीं ..।’अबहीं नन्हकू फुआ क जनरल नॉलेज टेस्ट…

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उघार होत बेरा चिल्ल पों काहें —?

का जमाना आ गयो भाया ,सगरो उंगरी उठे लागल बा । जे लमहर फरीछ बनके डोलत रहल ह ,ओकरे उजरकी धोतिया पर छिटकी पड़ल देखात बा । कतनों टह टह बरत होखे धोतिया ,छिंटकिया त चमकिए जाले , छिपे ना । अचके ई छिंटकिया आइल कहाँ से , ई अभियो एगो रहस्य बा । का अबले तोपल ढांकल रहल हे भा ई टटका पड़ल हे  , एकरो खोजबीन होखही के चाही । बाकि खोजबीन करी के , जे जे करे वाला बा , उ सभे कनई मे सउनाइल बा ।…

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कइसे बसी बसंत बनारस में

‘ गुरु ! बसन्त पंचमियो बीत गयल बाकिर एना पारी कवनो बसंत क राग-रंग नइखे जनात।फेड़ -फुनगी, फूल पत्ता धूर से अटल बाटे।कोइलियो ना बोलले अब त।का हो साह जी तोहार त सठवां बसंत लग गयल होई। कि ना? ‘ साह जी खदकत -फफात चाय क भगोना उतारे खातिर सँडसी खोजत रहलन बाकिर कहीं देखात ना रहे।ए कुल में ऊ एतना अफनायल रहलन कि उनके नन्हकू क बात मरिचा जस तीत लगत रहे। तीताई नन्हकू भांप गयल रहलन अउरी अब केहू दोसरे से बतकुच्चन करे खातिर छटपटाये लगलन। ‘का ए…

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बउझकवन के चउपाल

का जमाना आ गयो भाया, छाती के जगहा मुड़ी पर लोग मूंग दरे लागल । कुछ लोग पेंड़ा छील के खाये के फिराक मे जुटल बाड़ें त कुछ लोग बतरस आ बतकुचन के पगहा बरत बाड़ें । ओह पगहवा के का करिहें , एकर उनकरो के पता नइखे । मालिक के हुकुम बजावे खाति बस दिन रात जुटल बाड़ें । कनई के मइल लुगरी से पोछत बेरा ओकरे से आपन मुँहवों पोछ लेत बाड़ें । सगरों गज़ब के हाल चलत बा , सभे मगन होके लगल बा । बउझकवा के…

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जरिके मे काहे बदलि जाले बोली

का जमाना आ गयो भाया ,जेहर देखा जेसे सुना सभ बिखिआइए के बोल रहल बा । बोलत बेर इहो भुला जाता कि समाज मे ओकर एगो अलग पहचान बा । घर पलिवार से लेके संघतिया लोग तक बिखबोली मे लागल बा । संगही संगे सभे के बेवहार बदले लागल बा । लगता सभे के आँखि के सोझा  कवनो परदा लाग गइल बा भा दिन अछते दिनौधी हो गइल बा ।  रतौंधी वाला लोग ढेर मिल जाला बाकि दिनौंधी वाला लोग पहिले हेरे के पड़त रहने । अब त ओहनियों के…

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पिनकू जोग धरिहन राज करीहन

बंगड़ गुरू अपने बंगड़ई खातिर मय टोला-मोहल्ला में बदनाम हउवन। किताब-ओताब क पढ़ाई से ओनकर साँप-छुछुनर वाला बैर ह। नान्हें से पढ़े में कम , बस्ता फेंक के कपार फोड़े में उनकर ढ़ेर मन लगे। बवाल बतियावे में केहू उनकर दांज ना मिला पावे। घर-परिवार अड़ोसी-पड़ोसी सब उनके समझा-बुझा, गरीयाय के थक गयल बाकिर ऊ बैल-बुद्दि क शुद्धि करे क कवनों उपाय ना कइलन। केहु तरे खींचतान के दसवीं ले पढ़लन बाकिर टोला- मुहल्ला के लइकन के अइसन ग्यान बाँटें कि लइका कुल ग्यान के ,दिमाग के चोरबक्सा में लुकवाय…

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बाकि राउर मरजी —-?

का जमाना आ गयो भाया , जेने देखा ओनही ठेकेदारी आ ठेकेदारन बयार बह रहल बा । उहो लूआर अस , ओहमे फँसते केहुवो  झोकराइए जाई । कबों पुरूबी लूआर त कबों पछिमी । ओही मे कबों कबों उतरहिया आ दखिनहियों झुरके लगतिया । बाचल मुसकिल बा । एक त अबही दिल्ली के खराब हावा आफत मचवाले रहल हे , ओही मे जाड़े मे लुआर बहे लागल । बुझाता प्रकृतियो बउराय गइल बा , कबों कुछों त कबों कुछों । अजब हाल बा भाई । प्रवक्ता त बरसाती बेंग लेखा…

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हम भोजपुरिया साहित्यकार बानी आ तू ……?

का जमाना आ गयो भाया , जेहर देखा ओहरे मचमच हो रहल बा । सभके त भोजपुरिया साहित्यकार कहाये के निसा कपारे चढ़ के तांडव क रहल बा । 56 इंची वाला एह लोगन देखते डेरा गइल बा , एही से दिल्ली छोड़ के गुजरात भागल बा । मने हेतना बड़का , जे केकरो सुनबे न करे । दुवरे बइठल भगेलुवा के बड़बड़ाइल सुनके सोझवे से गुजरत सोमारू के ना रह गइल , त उहो हाँ मे हाँ मिलावे ला उहवें ठाढ़ हो के बतकुचन मे अझुरा गइने । का…

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