खेत खइलस गदहा …. मार खाई …….?

का जमाना आ गयो भाया , जोलहवा के त सामते आ गइल । जेके देखS , जेहर देखS ओहर एकही गो अवजिए सुनाता ….. बेच्चारा बेबात पिसाइल जात बा । कइल धइल केकर बा ई करम  आ जान पर केकरे बन आइल ।  रमेसर काका पांडे बाबा के पान के दुकानी पर ठाढ़ होते बड़बड़ाए लगने । देखS न , बाबा एगो सोझबक मनई के ओही के संघतिया सभे अइसन फंसवले बाड़न कि बेचारा न घर के बाचल न घाट के । अपने कूल्हि मिल के सब हजम क गइलें…

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बाबा बउरहवा क बनारस बचल रही

‘ ए गुरु देखला ह न कलकत्ता में कइसे ओभरब्रिजवा अरराय के गिर पड़ल।टिविया में देखते दिमाग सुन्न पड़ गयल रहे हमार त।बतावा भाय अइसे भला काल आवेल।कहत हईं कि घोर कलजुग नाचत ह।जहंवे देखा उंहवे नासे नास।का होई ए भोलेनाथ अब केहुवे ना बची का।’ नन्हकू चहकत-बमकत अड़ी के बतरस में आन्ही-पानी नियन कूद पड़लन। ‘ ए नन्हकू भइया ! तू साँचो में कलकत्ता वालन क दुःख में दुखी हउवा कि अपने चिंता में दुबरात हउआ ई बतावा.. आंय।बनरसो में त ओभरब्रिज बनते न ह।डेरा जिन कवनो दिन ओहितरे…

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पिनकू जोग धरिहन राज करीहन

बंगड़ गुरू अपने बंगड़ई खातिर मय टोला-मोहल्ला में बदनाम हउवन। किताब-ओताब क पढ़ाई से ओनकर साँप-छुछुनर वाला बैर ह। नान्हें से पढ़े में कम , बस्ता फेंक के कपार फोड़े में उनकर ढ़ेर मन लगे। बवाल बतियावे में केहू उनकर दांज ना मिला पावे। घर-परिवार अड़ोसी-पड़ोसी सब उनके समझा-बुझा, गरीयाय के थक गयल बाकिर ऊ बैल-बुद्दि क शुद्धि करे क कवनों उपाय ना कइलन। केहु तरे खींचतान के दसवीं ले पढ़लन बाकिर टोला- मुहल्ला के लइकन के अइसन ग्यान बाँटें कि लइका कुल ग्यान के ,दिमाग के चोरबक्सा में लुकवाय…

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लोक कलाकार भिखारी ठाकुर

लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के जनम  18 दिसम्बर 1887 में बिहार के सारण जिला के कुतुबपुर गांव में भइल रहे । अपना जनम प भिखारी ठाकुर लिखत बानी कि – बारह सौ पंचानवे जहिया , सुदी पूस पंचिमी रहे तहिया । रोज सोमार ठीक दुपहरिया, जन्म भइल ओहि घरिया ॥ अपना जीवन चरित के बारे में भिखारी ठाकुर जी लिखत बानी कि 8 बरिस ले ‘ नहोशी’ में बीतल , नउवा साल पढे खातिर पाठशाला गइनी बाकि साल भर में ‘ राम गति ‘ लिखे ना आइल आ फेरु पढाई…

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कबीर के दामपत्य प्रतीको में भोजपुरी की बानगी

सन्त लोगन क सबसे प्रिय प्रतीक दामपत्य भाव रहल । कबीर मूलतः सन्त रहनै। सन्तन मे दू प्रकार क योजना पावल जाला एगो परम्परा से मिलेला अऊर दूसर स्वयम अपने कवि करम से। कवि क जीवन दरशन अऊर मूल चिन्तन शैली क दर्शन होला। एही लिए सन्त कवियन मे प्रतीक बिधान देखेके मिलेला इ लोगन के अइसने प्रतीकन से उनकर पुरहर साधनात्मक जीनगी प्रतिबिम्बित होखेला । हाँ लोकजीवन अउर परम्परा से मिले वालन प्रतीकन के अपनावै मे अधिक रस लेनै । बियाह, गवना ,अउर तमाम प्रतीक लोक जीवन से ग्रहण…

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