विरह गीत

आधी रतिया सेजरिया से भाग गइले पिया अचके समुंदर के झाग भइले का बताईं कि केतना दरद बाटे दिल लागे सूना सजनवा के बिना महफ़िल कब उचरिहें बँडेरी के काग भइले आधी रतिया सेजरिया से भाग गइले पिया अचके समुंदर के झाग भइले ।। काहें कइलऽ कपट तू कन्हैया कहऽ काहें मनवा चोराके भोरवले रहऽ राग मधुबन के काहें विराग भइले आधी रतिया सेजरिया से भाग गइले पिया अचके समुंदर के झाग भइले ।। कहिया अइब बता दऽ तिथि वार दिन लेके आइब सुगंधित सुमन बिन-बिन हिया आवन के असरे…

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गीत

डार बिछुरल पतई कहली हमहुं त डार के लगहीं रहली। झोंका हवा के भुइयां पटकलस फेर जहवाँ ले गइलस गईली।। ना हमरो आपन केहु बा ना हम बानी कुछहु अपने संउसे डार गिरत बेरिया फूल-पतई देखत रही गईली।। एहन ओहन खूब घुमवलस तोड़ मचोड़ के टुकड़ा कइलस। फेर उड़ा के छितर-बितर करी लेई जा के गंगा में धइली।। गंगा हमके बहा ले गईली जा सागर से भेंट करइली सागर माथा लगहीं देखली देखी निहोरा उनका कइली।। एगो ढेला कतहीं से अइलस हमरा के उ गले लगइलस। टान-टून के पार उतरलस…

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मजदूर दिवस के कइसे देहिं बधाई

निक मजूरी के चलते छूठ गईल गउवाँ । हित नात कुल छूटल भूलाइल पुरखन के नऊवां ।। गावँ के बनिहार के, शहर मजूर बनवलस । निक मजूरी भेटाई इहे हँस के बतवलस ।। काम क घंटा यहां तय बा ये भाई । चाहे तपे सुरुज चाहे चले हवा हरजाई ।। होते सबेर लोगवा कारखाना और धऊरता । सपना होइ पूरा सोच आस के फुलवा मऊरता ।। बचवन के निक शिक्षा भेटाई । गरीबी के नाँव ई शिक्षा ही मिटाई ।। दवाई किनाई जवन माई के जिनगी बढ़ाई । बाबू के…

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मजदूर दिवस

बनी गईलन मजदूर हो जब भइलन सनेहिया से दूर हो। चिरई बोले से पहीले काम निपटा के चली भइले खेतवा के ओर हो।।जब……….।। चार रोटी संगे बाटे मिरिचा पियाज हो, कालह तरकारी बनीं लागल मन में आस हो, खेतवा के देखी-देखी चमकेला अँखिया के लोर हो।।जब……………।। लइकन के चहक से मनवा बिहसेला सगरी थकान तनिके में भाग जायेला इनके से बाटे सारा जिनगी अंजोर हो।। जब…………।। छोटकी मड़ईया महल अस लागे मेहरी के बतिया कोयल जस लागे बंधल बा पीरितिया के डोर हो ।।जब…………।। खुरपी-कुदाल हऊवे इनकर संगतिया रतिया ना…

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सजन धीरे- धीरे……..

कुम्हलाइल बा देहिया सजन पोरे-पोर आके मरहम लगा जा सजन थोरे-थोर देखले बानी हम जब से हेराइल बा होश हीया चिहुंकेला जब हम उठी ले भोरे-भोर हो गइल बा तब से ई लब मोर खामोश लाल से दूध अइसन भइल ठोर-ठोर मानवा नाचेला सोंची कब लेत आगोश देख बदरी के वनवा मे नाचे मोरे-मोर लालसा लाल के लागल बा द तू पूरा नेहिया अइसे तू जोड़ दिखे डोरे-डोर लाल बिहारी मनाई कतनों माने ना दिल झुलसे विरहा में हमरो बदन पोरे-पोर आके मरहम लगा जा……….   लाल बिहारी लाल

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रंग फागुन के

रंग फागुन के जीवन में घोलीं सभे, प्रेम के पर्व ह, खेली होली सभे ।   एह, में नइखे उमिर के बंधन कहीं, जात-धरम के ना कवनो बाधा कहीं । तन-बदन एकरा में डुबोलीं सभे, प्रेम के पर्व ह, खेली होली सभे ।   एह में घोरल, पुरूखन के आशीष बा, संग में जोरल, परिजन के संदेश बा । लेके आशीष शुभ -शुभ बोली सभे, प्रेम के पर्व ह, खेली होली सभे ।   देवता -देवी के एकरा में वरदान बा, मेल-जोल-एकता के अभयदान बा । एक हो जायीं फिर,…

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विदाई गीत

बोलिया में तोर बेटी घोरल बा मिठइया ले ले जालु आज तूँ, बिटोर हो मनवा सोचेला के अब चहकी अंगनइया देले जालु अँखिया में लोर हो…..| नेहिया के दुनिया में पंउआ धरेलू तरे तरे हियवा में काहे हो हहरेलू अलगे अंगनवा में बिलखेली मइया हियवा हमरो कमजोर हो….. | जनलीं ना जिनगी से बोलिया छिनाई नेहिया में बेटी छुटी, लोरवा बिनाई लोरवा के मोतिया ना मोतिया के लोरवा जियवा सहे ना हिचकोर हो…. | मांगी त मांगी रे बेटी कइसे तोर हँसिया हँसिया भइल रे जाला आज परदेसिया नेहिया सनेहिया…

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मैना

सँझिए त हँसत चैन नींनि सुतलू, रोवत भइल काहें भोर हो? के तोर खोंतवा उजारल ए मैना, कइके करेजवा कठोर हो? फुदुकत रहलू तू बाबा अंगनइया, भइया से करत टिसाही। माई की अँखिया की पुतरी के जोती, अर्हवल के कइलू ना, नाहीं। लीपि- पोती अंगना, बिहान- साँझि चिक्कन, कइलू तू घरवा अँजोर हो। छनहीं में दउरि दुअरवा की गइया के, अवरू बछरूआ के सानी। छनहीं भतीजवा के दूध- भात खोरवा, छनहीं में बाबा के पानी। रात- दिन टहल बजवलू, ना थकलू, कइलू ना मन कबो थोर हो। घोड़वा चढ़ल अइलें…

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एरी सखी

झुरवन महुइया के अनपत गछिया, एरी सखी! फुलवा चुएला अधरतिया, एरी सखी! अगतहीं जनतीं जे पिय बउरहिया, एरी सखी! बिरई में अगिया लगइतीं, एरी सखी! सपना के डहुँगी में अँकुरल टुसिया, एरी सखी! भँवरा करेले उतपतिया, एरी सखी! अगतहीं जनतीं जे, निफल ह सपना, एरी सखी! खुले नैना रयनि बितइतीं, एरी सखी! असरा क पाँखि थकल पातल देहिया, एरी सखी! पइतीं अलम तऽ सुहुतइतीं, एरी सखी! अगतहीं जनतीं जे बलम नियरवा, एरी सखी! बनि के सुगंधी लपटइतीं, एरी सखी! दिनेश पांडेय पटना

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मंजिल के बुर्ज

मंजिल के बुर्ज केहू चाननी छिरिक गइल। लिख गइल ह ताड़पात प कवन बियोग गीत? झरक-सरक गिर गइलसि भुद्द से जमीन प। ईर बने एक अउरि दोसरकी मीर बने, मनगुपुते दुइ पंखी आतुर अधीर मनें, चलि दिहले बेबस अस राह अंतहीन प। बँसवारी पाछु कवन नट्टिनी थिरिक गइल?   दिनेश पाण्डेय

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