घर के मजदूर

शहर मे हम मशहूर हईं। पर घर मे मजदूर हईं। भोरे पांच बजे उठ जाईं। गैस जलाईं चाय बनाईं। मेहरारु लगे ले जाईं। ओके जगाईं और पिआईं। जी हजूरी करत रहीलां हम येतना मजबूर हईं। हम घर मे मजदूर हईं। ओके शहरीयो मे ले जाईं। लुग्गा आ बिख्खो कीनवाईं। बाल्कनी मे फीलिम देखा के चाट मिठाई ओके खिआईं। खुश होके कहेली तब ऊ चमन के हम अंगूर हई। हम घर मे मजदूर हईं। रही-रही देली गीदड़भभकी। नइहर गईले के नित धमकी। जौन कहेली तौन करीलां तब्बो कहेली हमके सनकी। जौने…

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बदली जरूर

उमेद बा कि दुनिया बदली जरूर देखीं जुग राम के रावण के कन्हैया के चाणक्य-चंद्रगुप्त के अशोक के उनका भैया के का भइल? बदलिए नु गइल? चाहे रहल केहू केतनो मगरूर उमेद बा कि दुनिया बदली जरूर।। बदली त राग बदली रंग बदली बदलाव अकेले रउरे खातिर ना होई सबका संग बदली बदली त हवा बदली हाल बदली हमार तपस्या बदली राउर बवाल बदली माहौलो हो ता रंगीन समय नइखे दूर उमेद बा कि दुनिया बदली जरूर।। बदलाव कण कण में होई प्रीत में होई रण में होई लुकारी में…

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बेमारी

बलमा बढ़ जाए आगा, मोहे  टारी  ए  सखी, जब से धइले बा फेसबुक के बेमारी ए सखी ।   आधी-आधी   रतिया  ले   नेटवा  चलावेला, अपने   ना   सुते  संगवे   सभे-के  जगावेला। टीना जस  गरम होखे  बिपती भारी ए सखी, जब से धइले बा फेसबुक के बेमारी ए सखी ।   बेरि-बेरि बाजे  टुन-टुन  कबहीं  थरधराला, बड़का भिनुसहरा  ले जानू काथी  जोहाला । नित भहरत  बा  नाता  के  दोचारी  ए सखी जब से धइले बा फेसबुक के बेमारी ए सखी ।   आँख धंसि जोत घटी  दरद…

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जीवन पानी पानी

भीतर तक जाके घुसल बा राजनीति के तीर टुअर बनके घुमत बाड़े साधू सन्त फकीर I   उज्जर उज्जर कुरतावाला भेड़िया उत्पात मचवले बा थूक रहल बा सबके ऊपर सबके नाच नचवले बा I   पसर रहल बा चारु देने बारूदी बिषबेल पर्दा के पीछे से केहू खेल रहल बा खेल I   गुलमोहर के जंगल में लाग गइल बा आग मड़ई के ऊपर बैठल बा आके करिया नाग I   कंठ नदी के सूख रहल बा पोखर मांगे पानी निकल गइल बा हवा हवा के जीवन पानी पानी I…

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हे शहरी बाबू

हे शहरी बाबू न अइह$ हमरे गांव हो। फेर-फेर आवे के लेब$ नाही नाव हो।   आम और इमली के पेड़ बा कटाईल। अर्जुन यूकिलिप्टस के पौधा रोपाईल। पीपर के पेड़ सुखल मिली कहां छांव हो। हे शहरी बाबू न अईह$ हमरे गाँव हो।   राम अऊर रहीम घरे, भईल बंटवारा। बंटा गईल सगरो, दलान आ ओसारा। आपस मे बढल बाटे केतना दुराव हो। हे शहरी बाबू न अईह$ हमरे गाँव हो।   दूर-दूर ले चील गिद्ध ना देखाता। नीलकंठ देखे के सब अफनाता। अब बस कउवन के बा कांव-कांव…

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तू कब आबेला…

तोहार याद बहुत आबेला | तू दिल से कबहूं दूर न जाबेला || कईसन रोग लगाबल जो तू छोड़ के चली गइल तोहरी कसम संगे जीने-मरने की हमके याद बा इ तेरी बेबफाई हमके जीना करी दुस्सबार || तोहार याद बहुत आबेला | तू दिल से कबहूं दूर न जाबेला || पतझड़ भइल जिंदगिया हमार तुहसे कतनों करीं प्यार केकरा को बताब जमाना बहुत खराब तनिक आबा, तोहार याद बहुत आबेला | तू दिल से कबहूं दूर न जाबेला || रोई-रोई अंखियां सूखीं बिगडल हमरा हाल बीच भँवर में फस…

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देखा बसंत फिर आइल बा

सरसो के फूल फुलाय गयल अमवों देखा बउराय गयल पर झूरी-लोचन कै मुंहवां हर साल जइसे पियराइल बा देखा बसंत फिर आइल बा । जब-जब बसंत रितु आवैले बन – बाग बहार लिआवैले पर चम्पा चाची के घर में दुख के चादर फइलाइल बा देखा बसंत फिर आइल बा । पतई पूरान सब झरि जाले नई फुनुगी पेड़ पे उगि जाले पर जोखना करजा के लुह में टिकोरा जइसे चिचुकाइल बा देखा बसंत फिर आइल बा । जब हवा चलै त उठै महक कोयलिया गावै चहक-चहक पर कुहुकि रोवैं मीना…

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एथी उखरबा………?

केकर केकर का बिगरबा एथी उखरबा ॥   के देहलस तहरा जिनगी जिये क सउर फेरु होते सउर सूंघत बाटा घूर एकरो का फुनगी पकरबा एथी उखरबा ॥   ठप्पा लगते लूट खसोट आ गारी अरे ई काहो कवन बाटे बेमारी दुधवो के माछी नकरबा एथी उखरबा ॥   फेर लगल चाटे कबों मुँह कबों तरवा एकरा मुँह से निकरत डेंगू  के लरवा का मरदे ! ओकरS सकरबा एथी उखरबा ॥   डारत रहे मंठा आज हिलावत पोंछ का बखानी चरित उघारीं ओकर सोच हजमोला संगे डकरबा एथी उखरबा ॥…

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हेरत रहीं कविता के

ढेर लोग कहल ह आजु कविता दिवस ह मन के गउंखा से एगो आवाज आइल केकरे खाति लिखाई चोरन खाति बकचोन्हरन खाति थपरी के भिखमंगन खाति भा चुटकुलाबाजन खाति ।   फेर कविता नाही लिखाई काहें नाही लिखाई ? नेतवन खाति लुटेरवन खाति कामचोरन खाति सुखत इनरा के बेंग खाति ऊपरी चापरी बटोरे वालन खाति भा कवनों विशेष खाति ।   लिखीं कुछो कि न लिखीं एही मे अझुराइल भोरे से साँझ हो गइल जोजना लेखा जवन भूइयाँ नाही उतरे धूर माटी के डरे ।   बुझाता कविता के वाइरस…

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हम हेरीं आपन गौरैया

चीं चीं अब ना करS चिरइया हम हेरीं आपन गौरैया ॥   घर क अँगना दुवरा मड़इया ओरी बड़ेरी कुइयाँ ठइयाँ नाही फुदकत ता ता थइया ॥ हम हेरीं आपन गौरैया ॥   बिनी बटोरी खर पतवार सगरों हेरत पहिला प्यार नाही मटकत घर अंगनइया ॥ हम हेरीं आपन गौरैया ॥   चुहुल करत लइकन के संगे उड़त कबौं जगाई उमंगे मिलत नइखे घरहीं गवइया ॥ हम हेरीं आपन गौरैया ॥   नन्हका नन्हकी के भरमावत उपरि हाथ कइके बोलावत ठुनकत देखी लेत बलइया ॥ हम हेरीं आपन गौरैया ॥…

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