हे नारी तोहार केतना रूप

दुआर ओसार कुल साफ हो जायेके चाही , बाबू संझवे से सबके बिगड़त हउए । तनिको कही कसर ना रहे के चाही , बतायै देत हई । अबही हम स्कूले जात हई, देखी त मनेजर साहब काहे के बोलवले हउए । जब अपने घरे काम रहेला त बहरवौ अकाज पड़ल रहेला। अच्छा सुनत हउ कि ना हे भागवान , तोही से कहत हई । तनि बेटी के समझाय दिहा। माई बेचारी त गाय नियर ह। जवन बाबु कहि दें,  होखे के चाही । आज दिदिया के देखै बदे लइका वाले…

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भोजपुरी लोकगीत में नारी

भारतीय संस्कृति में हर प्रकार से विविधता देखल जा सकल जाला। ई विविधता भोजपुरी की गहना बन जाले। एगो अलगे पहचान बन जाले। इहे विविधते त अपना भोजपुरी संस्कृति के विशिष्टता देला आ अलग पहचान बनावेला। एह संस्कृति आ पहचान के कवनो बनल-बनावल निश्चित ढ़ाँचा में नइखे गढ़ल जा सकत। ई त बलखात अल्हड़ नदी जइसन कवनो बान्हो से नइखे घेरा सकत। ई त ओह वसंती हवा जइसन बावली, मस्तमौला आ स्वतंत्र ह, जवना पर केहू के जोर ना चलेला। अपने मन के मालीक। एह के कवनो दिशा-निर्देश के माने-मतलब…

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