अथक लड़ाई आउर धीरज के परीक्षा लेत भोजपुरी भाषा

अपना देश भारत मे हिन्दी के बाद सबसे जियादा लोगिन के मातृभाषा भोजपुरी कई दशक से अपने अस्तित्व के लड़ाई लड़ रहल बिया । चालीस के दशक से जवने भाषा के मान्यता के आवाज उठ रहल बा आउर ओकरे अस्तित्व के अनदेखी हो रहल बा , उहो एगो मिशाले बा । भोजपुरी भाषा के जनम आउर ओकर इतिहास 1000 बरिस से ढेर पुराना ह । एकर समय समय पर प्रमान सरकार के दीहल जा चुकल बा , बाकि हर बेरी कवनो – कवनो बहाना से मान्यता के बाधित कइल गइल…

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भोजपुरी के वर्तमान स्वरूप : गत्यात्मक आ विकासमान

अपना प्रिय अंदाज,मिसिरी के मिठास आ पुरुषार्थ के दमगर आवाज का कारन भोजपुरी शुरुए से आकर्षण के केंद्र में रहल बिया | भाषा निर्भर करेलेविशेष रूप से भौगोलिक कारन आ बोलेवाला लोगन के आदत,रुचि आ प्रकृति पर | विशेष परिस्थिति भी एह में आपन बरियार प्रभाव छोड़ेले | भोजपुरिया लोगन के अलग–अलग क्षेत्रन में प्रभावित करेवाला अलग–अलग कारकन का चलते भोजपुरी के भी कई गो रूप लउकऽता आ अभी तककवनो महाबीर एकरा के अनुशासित कऽके मानक रूप ना दे पवले | वर्तमान में ई काम आसान नइखे रहि गइल,बहुत कठिन बा | खासकर अइसना मेंजब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के भी जबर्दश्त प्रवेश भइल बा भोजपुरी में | जब भी अंकुश चली त मुद्रिते माध्यम का हाथ से,ओकर कवनो विकल्प नइखेबाकिर इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के प्रभाव सौ गुना अधिक रही | बहुत सोच समझ के,पूर्व योजना बनाइके ई काम करेके परी | एकरा बादे भोजपुरी भाषाअउर साहित्य के गत्यात्मक आ विकासमान वर्तमान स्वरूप कवनो भाषा के ईर्ष्या के विषय बन सकऽता |   भले भोजपुरी के मानकत्व अभी तक प्राप्त नइखे भइल बाकिर अधिकांश साहित्यकार एकर ध्यान रख रहल बाड़े कि अइसने प्रयोग चलावल जाव जवनमानकीकरण का चौहद्दी में समा सके,जवन सभका खातिर सुग्राह्य होखे आ तर्कसंगत होखे | जे अपना क्षेत्रीय बोली का मोह से ऊपर ना उठि पाई ओकरमेहनत कुछ पानी में भी जाई,एह में कवनो संदेह नइखे | कुछो होखे,लेखन कार्य चलत रहे के चाहीं आ आजु तक के भोजपुरी साहित्य संपदा पर खालीसंतोषे ना गर्व भी कइल जा सकऽता जेकरा भंडार में कवनो विधा के स्तरीय रचनन के अभाव नइखे | भोजपुरी प्रकाशक का अभाव आ छपाई में बेसीखर्च का चलते ढेर पुस्तक बरिसन से प्रकाशनाधीन बाड़ी सन आ प्रकाशित पुस्तकन के भी अशेष सूची बनावल शोध कार्य के विषय हो गइल बा | राष्ट्रीयआ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एकाध गो पुस्तकालयन का निर्माण से एह कार्य में सहूलियत मिल सकऽता,जो हर रचनाकार आपन किताब ओहिजा भेजे तऽ| हालॉकि अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन,पटना, भोजपुरी अकादमी,पटना आ रामसखी रामबिहारी स्मृति पुस्तकालय–सह–शोध संस्थान, सारण का सङही पांडेय नर्मदेश्वर सहाय,पं.गणेश चौबे,पांडेय कपिल,श्री जगन्नाथ,डॉ. नंदकिशोर तिवारी,डॉ. राजेश्वरी शांडिल्य जइसन एकसदस्यीयसंस्था भी एह संदर्भ में आपन भूमिका बखूबी निभवले बाड़ी सन आ आजो निभा रहल बाड़ी सन बाकिर ओके पर्याप्त नइखे कहल जा सकत | वर्तमान भोजपुरी के पत्र–पत्रिकन पर संतोष कइल जा सकऽता | एह घरी जबकि हिंदी में भी साहित्यिक पत्रिका कुछ रचनाकार सदस्यन का भरोसे चलरहल बाड़ी सन ओहिजा भोजपुरी में लघु पत्रिकन के अतना संख्या कम नइखे | कई गो पत्रिका बुता गइली सन बाकिर कई गो उदित भी भइल बाड़ी सन | कुछ पत्रिकन के कलेवर आ व्यक्तित्व अपना रंगीनियत में काफी आकर्षक बा | एह में संडे इंडियंस, भोजपुरी संसार पत्रिका आ सिने भोजपुरिया केनाँव खास तौर पे लिहल जा सकऽता | नियमित रूप से मासिक तौर पर छपेवाली पत्रिका में “भोजपुरी माटी” के ना भुलावल जा सके | अपनाठोस,संतुलित आ स्तरीय रूप के बरकरार राखेवाली पत्रिका में सम्मेलन पत्रिका, पाती, कविता आ सुरसती के नाम गर्व के साथ लिहल जा सकऽता | माई, पनघट, परास, भोजपुरी जिंदगी, भोजपुरी विश्व, सिरजनहार, साखी आदि पत्रिकन के भी अंक बहुत बढ़िया निकलतारे सन | छमाही पत्रिका “सूझ–बूझ” प्रवेशांके से भोजपुरी पत्रकारिता के एगो नया संभावना के रूप में लउकऽतिया | भारत का अलावे दोसर देशन से भी पत्रिकन के निकले के खबरमिलत रहऽता बाकिर देश में ओकरा अनुपलब्धता के कारण एह विषय पर गंभीरतापूर्वक कुछ कहल नइखे जा सकत | इंटरनेट पर अँजोरिया डॉटकॉम, भोजपुरिया डॉटकॉम, भोजपुरी एक्सप्रेस डॉटकॉम, भोजपुरीमूवमेंट डॉटनिंग डॉटकॉम, भोजपुरीलिरिक्स डॉटकॉम, जय भोजपुरी डॉटकॉम, चौराचौरी एक्सप्रेस, भोजपुरी अर्ग डॉटकॉम, बिदेशिया, पूर्बांचल एक्सप्रेस डॉटकॉम आदि पत्रिका अपना–अपना खास तेवर कासाथ काम कर रहल बाड़ी सन | खुशी के बात ई बा कि एह में हर साइट कवनो खास विधा खातिर विशेष रूप से जानल जाले सन | कवनो समाचार तकवनो साहित्य–संस्कृति,कवनो सोशल नेटवर्किंग,कवनो भोजपुरी अस्मिता,कवनो खूबसूरत पत्रिका त कवनो भाषायी आंदोलन खातिर चर्चित बाड़े सन | कवनो साइट के तेवर उग्र बा त कवनो के धीर,गंभीर,प्रशांत, कवनो के तेवरे नइखे त कवनो के एह से कवनो मतलब नइखे– ईश्वर का कृपा से जइसनबन जाए | साहित्य,संस्कृति से लेके गीत,संगीत,फिल्म,टीवी– हर क्षेत्र में सर्वाधिक चर्चित लगभग पचीस–छब्बीस गो वेबसाइट बाड़े सन | ई भोजपुरीखातिर गर्व के विषय बा | अतने ना कुछ वेबसाइट समाज आ संस्कृति खातिर घातक वेबसाइट,संस्था आ कार्यन पर भी निगाह जमवले बाड़े सन – भोजपुरी माटी खातिर ई शुभ संकेत बा | नेट का माध्यम से छठ के परसाद भेजाए लागल बा देश का कोना कोना में– ई सराहना के बात बा | कवनो भाषा आ भाषायी संस्कृति के व्यापक प्रचार–प्रसार में सिनेमा के महत्त्वपूर्ण भूमिका होले | भोजपुरी में ई अनमोल आ सुखद घड़ी आइल पहिलफिल्म “गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो“ के  1962  में रिलीज भइला से,जेकर मुहूर्त भइल रहे 1961 में | एकर निर्माता नाज़िर हुसैन जी के भोजपुरीसंसार कबो ना भुलाई | तब से कई गो फिल्म भोजपुरी भाषी क्षेत्र में हिंदी फिल्म के समानांतर सफलता के झंडा गाड़े शुरू कइली सन | 1986 तक केफिल्मन में लागी नाहीं छूटे रामा,बिदेशिया,दंगल,बलम परदेशिया,धरती मइया,गंगा किनारे मोरा गाँव,हमार भौजी,भैया दूज,दुलहा गंगा पार के के विशेषरूप से चर्चा कइल जा सकऽता | लगभग सात बरिस का अंतराल में भोजपुरिया दर्शक त जइसे भोजपुरी फिल्म के भुलाइए गइल | दरअसल ओह घरीतक  भोजपुरी फिल्म का ऊपर हिंदी फिल्म के मसाला फार्मूला पूरी तरह हावी हो गइल रहे | मौलिकता से कोसो दूर आ अपना माटी से भटकल भोजपुरीफिल्म के 2003 में फेरु से एगो नया जन्म मिलल ससुरा बड़ा पइसावाला से, जेकर अभिनेता रहन लोकगायक मनोज तिवारी आ तबसे जे भोजपुरीफिल्मन के दौर चलल त नया–नया प्रयोग करत अजुओ पूरा गति में बा | ई बात दीगर बा कि आज कई गो  भोजपुरी फिल्म बक्सा में बंद बाड़ी सन आ ढेरत  मुँहहीं का भरे गिरतारी सन बाकिर तबहुँओ निर्माता लोगन के आकर्षण का केंद्र में त ई बिजनेस बड़ले बा | एहिजा ई कहल ज्यादे ठीक होई किभोजपुरी फिल्म निर्माता लोगन के एह विषय पर मंथन करेके चाहीं कि काहें अतना असफल होतारी सन फिल्म | फिल्म के कथानक का साथ–साथ गीतआदि के भी पृष्ठभूमि जो भोजपुरी के आपन मौलिक ना रही त नीमन दिन देखे के लोभ छोड़हीं के परी | लोकगायन के भी चर्चा कइल ओतने जरूरी हो गइल बा काहेंकि भोजपुरी समाज पर ओकर खासा असर बा | एह में कवनो संदेह नइखे कि आजभोजपुरी संगीत मड़ई आ चौपाल से उठिके राष्ट्रीय आ अंतर्राष्ट्रीय मंचन पर आसीन हो चुकल बा आ ई बहुत खुशी के बात बा बाकिर एकर आयोजनअतना महङा होखे लागल बा कि मड़ई आ चौपाल से ई जइसे अलोपिते हो गइल बा | पइसा आ प्रचार का लोभ में लोकसंगीत का सङे खेलवाड़ो खूबभइल | नया धुन का चक्कर में कवनो अवसर के धुन कवनो अवसर के गीतन में भी खूब ढुकावल गइल बा | अगिला पीढ़ी खातिर लोकगीतन केवास्तविक धुनन के पहिचानल बहुत कठिन काम हो जाई | फूहड़ गीतन के बाढ़ि एकर रहल–सहल कोर–कसर भी पूरा कऽ दिहलसि | फूहड़पन आअसभ्य भाषा के लोकगायन में जबर्दश्त प्रवेश भोजपुरी संस्कृति खातिर बहुत बऽड़ खतरा बा | भोजपुरी संगीत खातिर लिखे जाएवाला गीतन केरचनाकारन में साहित्यकार लोगन के संख्या ना के बराबर बा– ई एगो बरियार कारन बा एकर | संस्कार गीत,धोबी गीत,जँतसार,रोपनी के गीत,पचराआदि लोकगीतन के संरक्षण आज के महत्त्वाकांक्षी गायकन का मिलावटी प्रवृत्ति का कारन चुनौतीपूर्ण हो गइल बा | एही तरह से सोरठी बृजभार,लोरकीआदि लोकगाथा आ गोंड़ऊ नाच (हुरका के नाच) आदि लोकनृत्यन के भी बचावल बहुत जरूरी बा | एह संदर्भ में वर्तमान बाजार में प्रतिष्ठित गायक लोगआ महुआ, ईटीवी आदि चैनल जो रुचि देखाई त संरक्षण के उमेदि कइल जा सकऽता | पिछला कई साल से संविधान के आठवीं अनुसूची में भोजपुरी के दर्ज करावे खातिर प्रयास चल रहल बा | एने एह में अउर तेजी आइल बा बाकिर सिवायआश्वासन के कवनो परिणाम तक यात्रा अभी पहुँचल नइखे | एमें कवनो संदेह नइखे कि भोजपुरीभाषियन के  संख्या भारत में बड़हन बिया , एकरासङही विश्व के कई गो देशन– मारिशस,सूरिनाम आदि के  मुख्य भाषा भी हऽ भोजपुरी | अइसना में एकरा साहित्य,संस्कृति आदि के विकासमान रूपमें अउरी बढ़ंती खातिर जरूरी बा कि संविधान के आठवीं अनुसूची में एकर नाम भी दर्ज होखो | अब त कई विश्वविद्यालयन में भी भोजपुरी के पढ़ाई चालू हो गइल बा आ कहीं न कहीं भोजपुरी से संबंधित चर्चा चलिए रहल बा– ई संतोष के विषय बा | बाकिर अतने से काम ना चली | खाली साहित्य–सृजन से बात ना बनी | साहित्य का अलावे भोजपुरी के भाषिक रूप पर भी मंथन कइल बहुत जरूरी होगइल बा | भाषाशास्त्री लोगन के चाहीं कि बिना कवनो पूर्वग्रह के बिना समय गँववले एह काम में भी लागि जाईं | जब तक भोजपुरी के मानक रूप केएगो मोटा–मोटी रूप भी सामने ना आई तब तक व्याकरण आदि के लेखन ओतना महत्त्वपूर्ण नइखे | लेकिन, एह सभसे जरूरी ई बात बा कि भोजपुरी के गैरसाहित्यकार वर्ग में ई जागरूकता ले आइल जाव कि लोग बाहर–भीतर हर जगह खुलकेभोजपुरी बोलसु, खरीदके भा माङिके  भोजपुरी के किताब आ पत्र–पत्रिका पढ़सु | एह तरह के जागरूकता अभियान भोजपुरी के अग्रणी संस्थन केचलावे के परी | बुद्धिजीवी वर्ग के दायित्व त अभी शुरूए नइखे भइल | अभी तक भोजपुरी के स्थिति ई बा कि ऊ अपने लोगन के नजर में सम्मान केभाषा नइखे | हमनी के बियाह ,जनेऊ आदि हर तरह के परोजन खातिर नेवता,पोस्टर आदि हिंदी का सङही भोजपुरियो में लिखे शुरू करेके परी | भोजपुरी सम्मान के क्रांति अब ज्यादा प्रासंगिक हो गइल बिया | जब तक एह शून्य से सम्मान यात्रा के शुरुआत ना कइल जाई आ जब तक हर जुबान सेभोजपुरी स्वाभिमान के रस ना बरिसे लागी, तब तक एह विषय पर कवनो गंभीर टिप्पणी महत्त्व नइखे राखत |   डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल संपर्क ‐ द्वारा‐ संदीप मजुमदार , ३ नं. लिंक रोड, बंधु महल क्लब के निकट , उत्तरायन (पलता) , पो. बंगाल एनमेल , जिला ‐ 24 परगना (नार्थ) प.बं. पिन ‐ 743122 मो.    91+9831649817             email : ramraksha.mishra@yahoo.com

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सभ कमिटी आ मापदंड भोजपुरी के सांविधानिक मान्यता ला?

देश के संविधान लागू भइल त 14 को भाषा अष्टम अनुसूची में आइल। तब कवनो मापदंड ना तय भइल रहे। 1967 में सिंधी भाषा अष्टम अनुसूची में आइल। तबहुँ ना कवनो कमिटी ना कवनो मापदंड। 1992 में कोंकणी, मणिपुरी आ नेपाली के शामिल कइल गइल। ना कवनो कमिटी ना ना कवनो मापदंड।2004 में बोड़ो, डोगरी,मैथिली आ संथाली के सांविधानिक मान्यता मिलल। ओहि बेरा ना कवनो कमिटी बनल ना कवनो मापदंड तय भइल। हाँ 1996 में अशोक पावहा कमिटी बनल। जेकरा संविधान के अष्टम अनुसूची में शामिल करे खातिर भाषा के…

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” कबीर अउर रैदास क बानी में भोजपुरी “

कबीर अउर रैदास दुनो भक्त दुनो जात बिरादरी मे निचले दरजा मे मानल जानेल जाने। आज भोजपुरी के लेके बड़ा गहमागहमी भइल बा अइसने मे रहि रहि के मन कबीर अउर रैदास पर चली जात ह। कबीर के सुभाव मे एक तेवर बा जबकि रैदास क बोली वचन बड़ा ही नरम बा। लेकिन दुनो समाज मे फइलल बुराई अउर अन्याय के खिलाफ बोलेलन । निष्काम भाव उनकर सबके बदे बा। रैदास जी क जनम छोट जाति मे भयल रहे लेकिन ओनकर अन्दर क बिसवास ओनकर ताकत रहल। रैदास लड़कपन से…

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