बिटिया अब बड़ हो गइल !!

दफ्तर से घरे आवे खाति जोहत ओकर मासूम चेहरा झरोखा से रासता निहारत , थाकल नींद मे मातल दूनो पियासल आँख हमरे गोड़ के अवाज सुनते केवाड़ी खोले के हल्दी मे धउरत ओकर दूनों पाँव ओकरा छोह से गोदी मे उठाके घरे अवते टाफी के उमेद मे फइलल नन्ही चुकी हथेरी ई कूल्हि आजु हमरा के अनासे इयाद आ गइल जब रोज नीयन टाफी देवे खाति जेबी मे डालत हमरे हाथ के रोकत साँय से कहलेस “बाबूजी” “अब हमरा के टाफी नाही , बाबूजी राउर जरूरत बा” तब हमरा के…

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नोबेल प्राइज विनर आयरिस कवि सिमस हीनी के कविता के भोजपुरी अनुवाद – खोदाई

हमार अंगूरी आ अंगूठा के बीचे टिकल बा पुरान लउकत कलम, बंदूक के लेखा चुस्त-दुरुस्त   हमार खिड़की के बाहर खनखनात-किरकिरात इकरी वाला ज़मीन के भीतरी धंसत कोदार के आवाज़ खुदाई कर रहल बाड़ें हमार बाबूजी , हम देखत बानी नीचे फूल के क्यारी के बीचे उनकर तनाइल पुट्ठा कबो निहुरत बा नीचे, कबो ऊपर उठत बा उ खेत कोड़त ताल मिलावत झुकत-तनत चल गइल बीस बरस पाहिले हमार मन ज़हवाँ उहाँ के आलू के खुदाई करत रहनी कोदार के बेंट धइले मजबूत हाथ से आलू के मेंड पर मारत…

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