अँगार जरो

अँगार जरो तहरा हिया नइखे जो प्यार हो अँगार जरो तहरा हिया।   ओहि रे अँगारवा में मान मद जरी जाए मन के घमंडवा के दससीस मरी जाए बरी जाए जड़-बनवा में बरम लुकार हो   जरे अंग अंग कि चढ़े रंग दोसरका एके गो देहिया के लोग ना हो फरका भले होखे दुश्मनवा जरि मरि खार हो   छल दम्भ भेद भाव मिली के मेटाव भाई भोजपुरिया हो मन के मिलाव जुगुत कइला पर बही उलटो जलधार हो। — केशव मोहन पाण्डेय —

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