बेटा बेचा गइल

समधी जी हम रउआ गोड़ पो पगरी राखत बानी हमरा बेटी के अपना लिहीं , भोला हाथ जोड़के अपना होखेवाला समधी के आगे गिड़गिड़ाये लगलन। देखीं हमरा के समधी मत कहीं अभी शादी नईखे भइल त इ नाता कइसन दीनदयाल रोब में बोललन।फिर हाथ जोड़के भोला कहलन , शदिया तऽ होइये नु जाई राउर कृपा के खाली जरूरत बा।देखीं जवन तय बा तवन तिलक चढ़े से पहिले किलियर कर दिहीं हम कहाँ कहत बानी कि शादी ना होई दीनदयाल कहलन। देखीं हम बहुत फेरा में अभी बानी पइसा के कवनो इंतजाम…

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बबुआ ला पिचकारी

रंग-बिरंग अबीर-गुलाल के दुकान लाईन से सजल रहे। लोग आपन लाईकन ला पिचकारी रंग के खरीदारी करत रहे। उहे बजार में एगो दस साल के छोट लाईका पीठ पर कबाड़ के बोरी टांगले दुकान सन के सामने से कई बार गुज़र चुकल रहे। कबाड़ बीनल त ओकर एगो बहाना रहे ऊ त मासूम आपन ललचाई नजर से पिचकारी और रंग-अबीर-गुलाल के देखत आवत जात रहे। मुंशी काका भी आपन दुकान पर बईठ के ई लाईका के देखात रले। अंत मे मुंशी काका से रहल ना गईल त ऊ पूछ बाईठले-…

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हमरे दुअरा पर चाँन अगराइल रे, बसंत रितु आइल रे !

जाड़ा-पाला से सिहरत-ठिठुरत चिरई-चुरुंग,धूर -धक्कड़ से सनल-पटल पेड़- रूख, उकठल -सुनसान खेत- सीवान अउर थकल -उदासल धरती क हरस-सरस के सिंगार करे आवेले बसन्त रितु। एह समय धरती -आकास सगरो उछाहे -उछाह देखाला।किसिम -किसिम क फूलन के सुगंध से फुलवारी मह-मह महक उठेले, बाग़-बगइचा बउरा उठेला। सरसों क पीयर सोनहुल रंग से खेत दमक उठेला। माने रितुवन में सबसे चटख, सबसे सुघर ,सबसे सुगन्धित ,सबसे मनभावन रंग ह रितुराज बसंत ।एह रितु में सगरो मनलुभावन, मोहन आनन्द देखे के मिल जाला। सांच पूछीं त इ आनन्द नवसृजन क ह,पतझड़ के…

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शक्ति के ही त नाम नारी ह

ई धरती पर सब इन्सान चाहे पुरुष होखे चाहे ऊ महिला होखे आपन जन्म के अधिकार के साथ अपना के विकास करे के चाहे आपन सपना पूरा करे के सबके बराबर के समानधिकार त होए के ही चाही पर 21वी शताब्दी जहवा इन्सान चाँद पर पर पहुंच गईल बा है बकिये औरत के प्रति सोच समाज के आजो संक़ीर्ण बा ।आजो ई पुरुष प्रधान समाज में नारी के साथ ओकर लौगिंक आधार पर भेद..भाव करल जायें ला औउरी ओकरा के शारीरिक रुप से कमजोर समझ के हेय दृष्टि से देखल…

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संघतिया

“काजी शादी में कवनो पुरान गर्लफ्रेंड अवतारी का , जे एतना सज तानी ? अतना त दूल्हा भी ना सवरीहे।” संजय के श्रीमती जी, टीबोली बोलली  ।  उ अपना बाल के डाई करत रहले। सबेरे से ही अपना साज सज्जा पर भिडल रहले। “हम शादी में ना जाएब। ” संजय कहले। “काहे के भरमावतानी। शादी में ना जाएब , फिर एतना श्रृंगार काहे करतानी ?” श्रीमती जी उनका बात के मजाक समझ के पूछलि। “आज ऑफिस में जरूरी मीटिंग बा। ” “मीटिंग और संडे के ? पहिले त कभी ना…

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