कइसे बसी बसंत बनारस में

‘ गुरु ! बसन्त पंचमियो बीत गयल बाकिर एना पारी कवनो बसंत क राग-रंग नइखे जनात।फेड़ -फुनगी, फूल पत्ता धूर से अटल बाटे।कोइलियो ना बोलले अब त।का हो साह जी तोहार त सठवां बसंत लग गयल होई। कि ना? ‘ साह जी खदकत -फफात चाय क भगोना उतारे खातिर सँडसी खोजत रहलन बाकिर कहीं देखात ना रहे।ए कुल में ऊ एतना अफनायल रहलन कि उनके नन्हकू क बात मरिचा जस तीत लगत रहे। तीताई नन्हकू भांप गयल रहलन अउरी अब केहू दोसरे से बतकुच्चन करे खातिर छटपटाये लगलन। ‘का ए…

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प्रेम -प्रेम सब कोई कहे ,प्रेम न चीन्हे कोई…..

साहित्य -सरिता क फरवरी अंक “प्रेम -विशेषांक ” ह। ग्यानी -ध्यानी पुरखा -पुरनिया प्रेम के अकथ -अबूझ कहले हउवन।सचहूं, कहाँ केहू गुन-गथ पउलस प्रेम के ? जे एह अबूझ के बूझ लिहलस ऊ परम आनंद में मगन,सुध -बुध बिसरवले मगन मन गावे -नाचे लगल आ दीन -दुनिया से बेखबर ‘चैतन्य ‘ हो गइल,’मीरा’ हो गइल।कबीर ,तुलसी ,रैदास हो गइल।पीर में मातल,नेह में भोरल ‘घनानंद’ हो गइल।केतना -केतना कहाइल, केतना गवाइल, केतना बखानल गइल बाकिर प्रेम क खिस्सा ,कहनी ,गीत,ओतने अजान, ओतने रहस्यमय,ओतने नया, ओतने पुरान आजो ह जेतना सृष्टि के…

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ए बचवा सुन

ए बचवा सुन अपेक्षित आ उपेक्षित के रात में पढ़ लीह टंच से, कल्हु एकरे के पढे़ के बा शपथ ग्रहण के मंच से। ए बाबू काल्हु ना पढे़ आई त बिलार जस मति खीसीअईह, जहां केहु कुछुओ कहल त तुं आपन असली रुप देखईह। चुप बकलोल, ई का कहले अईसन जाति-2 चिचीआईब कि हमार सभ जाति खलबला जईंहे, राज्यपाल के अईसन मगज खराब होई कि उ खडे़ मंच प पगला जईंहे। कहसु कवि देवेन्दर हो सकेला ई बात कुछ जाति विशेष के बाउर लागे, बाकी ईहो हो सकेला कि…

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बउझकवन के चउपाल

का जमाना आ गयो भाया, छाती के जगहा मुड़ी पर लोग मूंग दरे लागल । कुछ लोग पेंड़ा छील के खाये के फिराक मे जुटल बाड़ें त कुछ लोग बतरस आ बतकुचन के पगहा बरत बाड़ें । ओह पगहवा के का करिहें , एकर उनकरो के पता नइखे । मालिक के हुकुम बजावे खाति बस दिन रात जुटल बाड़ें । कनई के मइल लुगरी से पोछत बेरा ओकरे से आपन मुँहवों पोछ लेत बाड़ें । सगरों गज़ब के हाल चलत बा , सभे मगन होके लगल बा । बउझकवा के…

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जरिके मे काहे बदलि जाले बोली

का जमाना आ गयो भाया ,जेहर देखा जेसे सुना सभ बिखिआइए के बोल रहल बा । बोलत बेर इहो भुला जाता कि समाज मे ओकर एगो अलग पहचान बा । घर पलिवार से लेके संघतिया लोग तक बिखबोली मे लागल बा । संगही संगे सभे के बेवहार बदले लागल बा । लगता सभे के आँखि के सोझा  कवनो परदा लाग गइल बा भा दिन अछते दिनौधी हो गइल बा ।  रतौंधी वाला लोग ढेर मिल जाला बाकि दिनौंधी वाला लोग पहिले हेरे के पड़त रहने । अब त ओहनियों के…

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