बोरसी

घर में नाया सामान के अइला पर पुरनका के पूछ घट जाला कबो कबो त खतमें हो जाला , कमो बेस घर परिवार आ हितइयो के ईहे हाल होला जइसे जीजा के अइला पर फूफा के पूछ कम हो जाला, बेटी के होते बहिन के पूछ घट जाला ,नात नतकुर के होते आजा आजी पर फोकस कम हो जाला । ठीक अइसहीं अनदेखी क सिकार बेचारी ‘बोरसी’ देवी भी भइल बाड़ी। हीटर आ ब्लोवर के अइला से बोरसी देवी घर से बहरे क दीहल गइली, एकाध जनी बचल बाड़ी त…

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मंजिल के बुर्ज

मंजिल के बुर्ज केहू चाननी छिरिक गइल। लिख गइल ह ताड़पात प कवन बियोग गीत? झरक-सरक गिर गइलसि भुद्द से जमीन प। ईर बने एक अउरि दोसरकी मीर बने, मनगुपुते दुइ पंखी आतुर अधीर मनें, चलि दिहले बेबस अस राह अंतहीन प। बँसवारी पाछु कवन नट्टिनी थिरिक गइल?   दिनेश पाण्डेय

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लोग कथी कहिहें

सभ परेशान बाटे लोग कथी कहिहें। बेंवत तलाशे ले कि मट्ठा कइसे महिहें। बाबूजी के राज रहे खूब रहे चलती। अस्सी बीघा जायदाद दस बीघा परती। पौनी लो के मिलत रहे अगऊँ निकाल के। बोझा-पंजा अलगे दियात रहे साल के। बखरा – बँटाई भइले खेत भइल काठा। ताके ला लो दूध बदे मिले कहाँ माठा। दादाजी के बरखी में दस कोस खा गइल। बाबूजी के बरखी में बिगहा नपा गइल। पूछले कन्हैया, ” भई, काहे ई तबाही बा? ” मिलल जवाब ई- “असहीं बाहबाही बा? बिना मेलजोल के समाज कइसे…

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यथार्थ के धरातल पर पड़ल पदचाप के गूँज “पहिलका डेग”

अपने माई भाषा मे साहित्य रचल आउर ओकरा जीयल , माई भाषा आउर अपना माटी खाति एगो लम्हर समरपन होला । भोजपुरी भाषा के मिठास केहु से छिपल नइखे । भोजपुरी काब्य संग्रह “पहिलका डेग” , अशोक कुमार तिवारी जी के एगो आइसन फूल बा , जवना के उ माई भाषा के चरण मे अर्पित कइले बाड़े । वकालत के संगे संगे भाषा अउरी साहित्य के सेवा मे लागल तिवारी जी के रचना भाव प्रवण आउर गंभीर बाड़ी सन । उनुका पारखी नजर सागरो गइल बा । जवान कवि के…

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आज के समाज मे…

आज के समाज मे बहुत अइसन काम हो रहल बा जेकरा बारे मे हमनी के पूर्वज कबो कल्पना तक ना कईले होहिए I रोज अइसन-अइसन बात हमनी के समाज से सामने आ रहल बा जेकरा सुन के कान पर विश्वास नईखे होखत की आईसनो हो सकत बा I अभी हाल ही मे एगो समाचार आइल रहे की गुरुग्राम के एगो स्कूल मे एगो बच्चा के सौचालय मे चाकू से ओही स्कूल के दोसर बच्चा एह से मार देहलस की ओकर पी टी एम टल जाए कुछ दिन खातिर , ई…

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आपन बात

आभाषी दुनिया के मकड़जाल मे अझुराइल अदमी के लग्गे अपने भाषा के लेके केतना समय बा , एकर उत्तर खोजे के जरूरत नइखे । उत्तर सगरों छीटाइल बा , देखि समझी आउर बिचारी । ना जाने केतनी भोजपुरी के पत्र पतिरका कब शुरू भइनी स , आ कब बन्न हो गइनी स , केतना जाने के मालूम बा ? ओहमे एगो पतिरका इकाई के अंक से दहाई के अंक मे पहुँच रहल बा , सराहे जोग बा । जवन समाज अपने कर्मठता ला जानल जाला , आज उहे समाज आपन…

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गउआं के माटी

मुंबई  के ताज होटल जुहू चौपाटी सबका से नीमन बा गउआं के माटी|   धनवां के ढेरी जब लउके खरिहनवां बाबूजी के ओठवा खिलल मुसकनवां सरसो के फूलवा से महकल सिवनवा लगेला सुनाये तब फगुआ के तनवा   देखत उतान होइ गईल मोर छाती सबका से नीमन बा गउआं के माटी|     मन भावे बरम बाबा के चउतरवा भोरहीं अजान संगे गूंजे जयकरवा कहीं गूंजे मानस क दोहा चौपाई कहनीं सुनावे रोज रतिया के माई   चइता आ कजरी के बोल जहाँ खांटी सबका से नीमन बा गउआं के…

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