बड़की माई

ए बबुआ काल्ह जवन बाजारी से चीनी ले आइल रहस नु ओहमें हतना कम बा , बड़की माई तपेसर के हाथ में एगो झिटिका पकड़ा के कहली । बड़की माई त का सोचतारू हम चिनिया खा गइल बानी , अरे ना रे मटिलागाना बनिया नु डंडी मरले बा जाके ओकरा से देखइहे आगे से बरोबर दीही। आ फिर ओसहीं हो जाई त का करबु । ना नु होई ओकरा से लेबे से पहिले इयाद दिला दिहे कि पिछला बेर कम देले रह एह बेर ठीक से जोखिह । फिर दोसरा…

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पियार के समुंदर के अरारी पर

एगो समुंदर के अरारी पर बइठल लहर के देखनी अपने ओरी आवत ढेर नीमन बुझाइल ओकर छुवन लागल जइसे ई तहरे बा छुवन एकदमे तहार पहिले नीयर तहरों के इयाद बा का साँस मन के भाव सुघर मिठकी बोल इहवाँ से तनि बालू के देखा केतना सुघर बा चारो ओरी फइलल नवहन के सपना लेखा हमनी के त बूढ़ा गइनी बाकि पानी आउर असमान अजुवो जस के तस बा लहर त बेर बेर बहरे आवता फेर समुंदर मे लउट जाता तहार इयादो ओइसे बा बाकि तू त हमरा के जाए…

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पिनकू जोग धरिहन राज करीहन

बंगड़ गुरू अपने बंगड़ई खातिर मय टोला-मोहल्ला में बदनाम हउवन। किताब-ओताब क पढ़ाई से ओनकर साँप-छुछुनर वाला बैर ह। नान्हें से पढ़े में कम , बस्ता फेंक के कपार फोड़े में उनकर ढ़ेर मन लगे। बवाल बतियावे में केहू उनकर दांज ना मिला पावे। घर-परिवार अड़ोसी-पड़ोसी सब उनके समझा-बुझा, गरीयाय के थक गयल बाकिर ऊ बैल-बुद्दि क शुद्धि करे क कवनों उपाय ना कइलन। केहु तरे खींचतान के दसवीं ले पढ़लन बाकिर टोला- मुहल्ला के लइकन के अइसन ग्यान बाँटें कि लइका कुल ग्यान के ,दिमाग के चोरबक्सा में लुकवाय…

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का अब सामाजिक अनुशासन के जरूरत नइखे ?

पलिवार एगो अइसन संस्था ह , जवन अनुशासन के संगे नेह – छोह आउर रिस्तन के अपने मे बन्हले आ जोगवले आगु बढ़ेला । जहवाँ आदर – सनमान  , छोट – बड़ के गियान आ समझ के सोर ढेर गहिरा से जकड़ेले , समाज के ताना – बाना के मजगुती देले । समाज के भीतरी के बुनावट के संभार के इंसानियत के रसते एक दूसरा के सहारा बने के भाव उपजावेले । एकरे चलते पलिवार के इजत समाज मे दमगर रहेला ।  आपुसी रिसता के मोल आ महातिम , एक…

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