जस करनी तस फलिहारी

जस करनी तस फलिहारी रात अन्हरिया , बाबूजी । साँच कह मुँह मारल जाय बात अनेरिया , बाबूजी ।   शहरी लौछार लगल जब भिहिलाये भीत लगल तब लाग लपट भउकन सोझे कुच कुच करिया, बाबूजी ।   ऊसर डाबर सोच भइल नेह क गठरी नोच गइल बमकत बन के जज़बाती बाजल थरिया, बाबूजी ।   अनचिन्हल सभही नाता संस्कार संगे  बिलाता सपनन के रोज समापन बोझ डहरिया, बाबूजी ।   मन कुल्हरे, जन कंहरे बीपत बा सगरी तहरे क़हत सुनत बीतल जिनगी राग खबरिया , बाबूजी ।   जयशंकर…

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