भोजपुरी की ‘मैना’ मैनावती देवी मौन हो गइनी

जहाँ मेढ़िये खेतवा चरि जाला जहाँ मेढ़िये खेतवा चरि जाला का करिहें भइया रखवाला। जहाँ नदिये पानी पी जाई जहाँ फेड़वे फलवा खा जाई, जहवाँ माली गजरा पहिरे ऊ फूल के बाग उजरि जाला। जहाँ… जहाँ गगन पिये बरखा पानी धरती निगले सोना-चानी, जहवाँ भाई-भाई झगड़े ============== नई दिल्ली। भोजपुरी के अपने गायकी से  पहचान दिवावे  वाली, लोकगीतन  से सामाजिक जीवन के  उकेरे वाली लोकगायिका मैनावती देवी श्रीवास्तव के जनम  बिहार के सिवान जिले के  पचरूखी में 1 मई 1940 के भइल रहे । बाकि उ आपन करम भूमि गोरखपुर के बनवनी…

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“पीपर के पतई ” नागपुर मे

अबकी बेर के यात्रा खूब सुखद रहे । एह यात्रा मे आपन किताब “पीपर के पतई” नागपुर में आदरणीय श्री नितिन जी गडकरी के अपने प्रिय श्री राम प्रकाश मिश्रा जी के संगे भेंट कइनी ।भेंट के संगे भोजपुरी भाषा के मान्यता ला चर्चा भइल ।

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भोजपुरी अध्ययन केंद्र वाराणसी में भोजपुरी पंचायत के विमोचन

आज भोजपुरी अध्ययन केंद्र वाराणसी में भोजपुरी पंचायत के विमोचन आ कार्यकारी संपादक के सम्मानित कइल गइल। भोजपुरी के आदि कवि कबीर के धरती पर अपने उद्बोधन में द्विवेदी जी कहनी कि भोजपुरी के रचनात्मक आंदोलन के संगे संगे भोजपुरी भाषा के मान्यता आंदोलन में काशी के आपन महती भूमिका निभावे के जरुरत बा। अब उचित समय आ गइल बा।द्विवेदी जी छात्रन के भोजपुरी में लिखे खाति प्रेरित कइने।   कुलदीप श्रीवास्तव

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आपन बात

भोजपुरी साहित्य सरिता क इ अंक आप लोगन के सौंपत के बहुत हर्ष होत बा। सबसे बड़ी खुशी क इ बात ह कि ई अवसर कार्तिक महिना के बा । कउनो राष्ट्र देश के सांस्कृतिक वैभव क परिचायक उहवां के लोक साहित्य होखेला। जवने से उहवां के संस्कार परंपरा जीवन आदर्श उत्सव विषाद नायक नायिका रितु गीत विवाह गीत भजन राजनीतिक सामाजिक धार्मिक गीतन के बोल में समाहित रहेला। वइसे तो हर देश के आपन एक परम्परा होखेला लेकिन हमरे देश के बात निराला बा। इहवा “कोस -कोस पर बदलें…

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कोठेवालियाँ

रानी के बियाह क बड़ा.शोर ह बरात बलिया से आयील ह,दश दिन पहिलवै से टेंट तम्बू लगै शूरू हो गयल ,अरे होहि के चाहि आखिर तहसीलदार साहब क पहिली बेटी बिहल जात बा,दुआरे क रौनक त देखतै बनत बा।तहसीलदार साहब खूदै हर चीज क निगरानी करत हउए।खूटा गाड़े बदे बास चाहत ह ,उदया लगत बा किआज कुल बसवरिय काट घली,इ उदया सुसुरा तहसीलदार के देखैला चार पोरसा ऊपर चढ़ जाला।अउर आज त रमेशो (तहसीलदार क भाय)आवैके हउए।रमेश बहुत दिलदार मनयी हउए ,ओनके बारे मे का-का बतावै…जब उ पढ़ै जा ओनकर…

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आपन बात

साहित्य के चउखट पर ठाढ़ ऊँट कवने करवट बइठ जाई , आज के जमाना मे बूझल तनि टेंढ ह । कब के टोनहिन नीयर भुनभुनाए लागी आ कब के टोटका मार के पराय जाई ,पते ना चले । आजु के जिनगी मे कवनों बात के ठीहा ठेकाना दमगर देखाई देही , भरोष से कहलों ना जा सके । एगो समय रहे जब मनई समूह मे रहत रहे , अलग समूह – अलग भाषा –बोली , रीत – नित सभे कुछ कबीला के हिसाब से रहे । ओह कबीलन मे अपने…

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खेत खइलस गदहा …. मार खाई …….?

का जमाना आ गयो भाया , जोलहवा के त सामते आ गइल । जेके देखS , जेहर देखS ओहर एकही गो अवजिए सुनाता ….. बेच्चारा बेबात पिसाइल जात बा । कइल धइल केकर बा ई करम  आ जान पर केकरे बन आइल ।  रमेसर काका पांडे बाबा के पान के दुकानी पर ठाढ़ होते बड़बड़ाए लगने । देखS न , बाबा एगो सोझबक मनई के ओही के संघतिया सभे अइसन फंसवले बाड़न कि बेचारा न घर के बाचल न घाट के । अपने कूल्हि मिल के सब हजम क गइलें…

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