ऑक्सीजन से भरपूर ‘पीपर के पतई’

कहल जाला कि प्रकृति सबके कुछ-ना-कुछ गुण देले आ जब ऊहे गुण धरम बन जाला त लोग खातिर आदर्श गढ़े लागेला। बात साहित्य के कइल जाव त ई धरम के बात अउरी साफ हो जाला। ‘स्वांतः सुखाय’ के अंतर में जबले साहित्यकार के साहित्य में लोक-कल्याण के भाव ना भरल रही, तबले ऊ साहित्य खाली कागज के गँठरी होला। बात ई बा कि अबहीने भोजपुरी कवि जयशंकर प्रसाद द्विवेदी जी के पहिलकी कविता के किताब ‘पीपर के पतई’ आइल ह। ई किताब कवि के पहिलकी प्रकाशित कृति बा बाकिर ऊहाँ…

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पियSकड़वा यार

हमार गाँव के तीन यार रले। सुखन मियाँ,  रुबिन मियाँ , साधु पासवान। तीनो मे बहुत दोस्ती रहे। तीनो एके साथ ईटा पाथे चेमनी पर जा सन और एके साथे ईटा पाथ के चेमनी के पथेरी से वापस आवसन। अगर कवनों दोस्त के ईटा पाथे मे देरी हो जाए तS तीनो एक दुसरा के मदद कके जल्दी जल्दी एके साथे ईटा पाथ के चट्टी पर पहुँचत रले सन। जब तीनो यार चट्टी से वापस पैदल आवसन तS केहु माई के लाल ना रहे जे ऐ ई तीनो से बतीया लेव।…

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देश हित खातिर कर्तव्य

देश जोड़े वाला देश हित में बात करिंजा। नाही धरम धरम नाही जात-पात करिंजा । देश जोड़े वाला देश भारत के सपूत सबे भारत के जवान बा हिन्दू ,सिक्ख ,इसाई चाहे कवनो मुसलमान बा भारत बढ़े खूबे मेहनत, दिन -रात करिंजा देश जोड़े वाला देश सब बा भारतवासी अलगा अलगा जिम्मेवारी बा शिक्षक शिक्षा दान फौजी खातिर देश रखवारी बा आपन संगे अपने से ना ,घात करिंजा देश जोड़े वाला देश घर के मेहरारू घर के ले ली जिम्मेवरिया आऽपन कर्तव्य खूबे बूझे नाऊ बरिया आगे बढ़े वाला बढ़े ,ना…

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लेखक औरी कवि लोगन से निहोरा

कवनो समाज के बिकास में ओकरा लेखकन / कवि / कलाकारन के बहुत बड़ जोगदान होला आउर भोजपुरी लोक साहित्य के बिकास में उनकर योगदान केहू से छिपल नइखे। हम भोजपुरी साहित्य सरिता के ओरी से राउर लोगन से निहोरा करत बानी कि राउर सभे आपन रचना भेजीं ताकि ऊ सबका सोझा राखल जा सके। राउर आपन कबिता, कहनी , लघुकथा भा साहित्य के केवनो बिधा होखे भेजीं। ई हमनी के अहोभाग रही कि ओके छाप सकीं जा। रचना भेजे के बेरा ए बातन के खियाल राखे के किरिपा करीं…

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भोजपुरी में बाल साहित्य

प्राचीन काल में भोजपुरी बिहार प्रांत के भोजपुर, आरा ,बलिया, छपरा, सीवान, गोपालगंज आ यूपी के कुशीनगर, देवरिया गोरखपुर, महराज गंज ,सिद्धार्थ नगर, मऊ , आजमगढ़, गाजीपुर आ बनारस के भाषा रहे बाकिर अब्ब आपन भोजपुरी एगो अंतर्राष्ट्रीय भाषा हो गइल बाटे । भोजपुरी खाली भारत के बिहारे यूपी  के भाषा ना रहिके नेपाल , मॉरीशस, फीजी, गुआना, सूरीनाम जइसन देशन में भी बोलचाल के भाषा के रूप में फइल गइल बा । भोजपुरी भाषा में सभ तरह के साहित्य रचल जा रहल बा बाकिर बाल साहित्य के नाम पर…

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बाबा बउरहवा क बनारस बचल रही

‘ ए गुरु देखला ह न कलकत्ता में कइसे ओभरब्रिजवा अरराय के गिर पड़ल।टिविया में देखते दिमाग सुन्न पड़ गयल रहे हमार त।बतावा भाय अइसे भला काल आवेल।कहत हईं कि घोर कलजुग नाचत ह।जहंवे देखा उंहवे नासे नास।का होई ए भोलेनाथ अब केहुवे ना बची का।’ नन्हकू चहकत-बमकत अड़ी के बतरस में आन्ही-पानी नियन कूद पड़लन। ‘ ए नन्हकू भइया ! तू साँचो में कलकत्ता वालन क दुःख में दुखी हउवा कि अपने चिंता में दुबरात हउआ ई बतावा.. आंय।बनरसो में त ओभरब्रिज बनते न ह।डेरा जिन कवनो दिन ओहितरे…

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डिस्को पंडित के नामकरण

सन १९८४ में जब राम नगीना मिसिर के बड़का लईका के बियाह ठनाईल त मिसराइन न्योतली मोहल्ला के पड़ाइन शुक्लाइन डाक्टराईन ठकुराईन गडाईन तिवराईन दुबाईन गुप्ताईन इंजीनियाराईन अउरि मालिक के दफ़्तर के हेड क्लर्क लालबिहारी मिसिर के मेहरारू लक्ष्मी के   २४ बरीस के होखलें दुन्नो मिसराइन के लईका बाकिर लक्ष्मी के लईका पप्पू के बियाहे में रघुवीर जाने अबेर भईल सकल से चकोर चित्त से पानी चरित्र से राम लक्ष्मी के छोट लईका बी.ए के पढ़ाई छोड़ दिहलें अउर सरकारी नोकरी नाहीं सपरल त करे लगलें पंडिताई बाऊजी के…

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भइया मलहवा रे

भइया मलहवा रे, कवने घटिया लागी नइया मोर।। नदिया अगम लागे, सघन सेवार आगे, भइया मलहवा रे, कतहीं ना लउकत बाटे छोर। भइया मलहवा रे, कवने घटिया लागी नइया मोर।। नाही गइनी पुरुब पछिम देखनी ना उतर-दखिन भइया मलहवा रे, असरा लागल बाटे तोर। भइया मलहवा रे, कवने घटिया लागी नइया मोर।। नदिया फुलाइल बिआ देखि-देखि काँपे हिया भइया मलहवा रे, घेरले अन्हरिया घनघोर। भइया मलहवा रे, कवने घटिया लागी नइया मोर।। रामपति रसिया सोई दिहनी समइया खोई भइया मलहवा रे, भइल चाहत बाटे भोर। भइया मलहवा रे, कवने घटिया…

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हे नारी तोहार केतना रूप

दुआर ओसार कुल साफ हो जायेके चाही , बाबू संझवे से सबके बिगड़त हउए । तनिको कही कसर ना रहे के चाही , बतायै देत हई । अबही हम स्कूले जात हई, देखी त मनेजर साहब काहे के बोलवले हउए । जब अपने घरे काम रहेला त बहरवौ अकाज पड़ल रहेला। अच्छा सुनत हउ कि ना हे भागवान , तोही से कहत हई । तनि बेटी के समझाय दिहा। माई बेचारी त गाय नियर ह। जवन बाबु कहि दें,  होखे के चाही । आज दिदिया के देखै बदे लइका वाले…

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