हेरत रहीं कविता के

ढेर लोग कहल ह

आजु कविता दिवस ह

मन के गउंखा से एगो आवाज आइल

केकरे खाति लिखाई

चोरन खाति

बकचोन्हरन खाति

थपरी के भिखमंगन खाति

भा चुटकुलाबाजन खाति ।

 

फेर कविता नाही लिखाई

काहें नाही लिखाई ?

नेतवन खाति

लुटेरवन खाति

कामचोरन खाति

सुखत इनरा के बेंग खाति

ऊपरी चापरी बटोरे वालन खाति

भा कवनों विशेष खाति ।

 

लिखीं कुछो कि न लिखीं

एही मे अझुराइल

भोरे से साँझ हो गइल

जोजना लेखा

जवन भूइयाँ नाही उतरे

धूर माटी के डरे ।

 

बुझाता कविता के

वाइरस लाग गइल

कापी पेस्ट वाला

मालवेयर लपटा गइल

भ्रष्टाचार वाला

रूट किट घुसुर गइल

खुनवे मे कैंसर लेखा

रूटकिट सेंधमारी क लीहलस

जर बोखार लेखा

फेर त हेरत रहीं कविता के

कविता के तासीर के

छंद मात्रा के

बस हेरत रहीं ।

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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