हमरे दुअरा पर चाँन अगराइल रे, बसंत रितु आइल रे !

जाड़ा-पाला से सिहरत-ठिठुरत चिरई-चुरुंग,धूर -धक्कड़ से सनल-पटल पेड़- रूख, उकठल -सुनसान खेत- सीवान अउर थकल -उदासल धरती क हरस-सरस के सिंगार करे आवेले बसन्त रितु।

एह समय धरती -आकास सगरो उछाहे -उछाह देखाला।किसिम -किसिम क फूलन के सुगंध से फुलवारी मह-मह महक उठेले, बाग़-बगइचा बउरा उठेला। सरसों क पीयर सोनहुल रंग से खेत दमक उठेला।

माने रितुवन में सबसे चटख, सबसे सुघर ,सबसे सुगन्धित ,सबसे मनभावन रंग ह रितुराज बसंत ।एह रितु में सगरो मनलुभावन, मोहन आनन्द देखे के मिल जाला।

सांच पूछीं त इ आनन्द नवसृजन क ह,पतझड़ के बाद क सिंगार-पटार क ह।हँसी-ठिठोली क ह, राग-रंग ह।झिरी-झिरी बहे वाली फगुनहटा बयार क ह।ढोल-मंजीरा ,झांझ क ह। इ रितुराज जन-बन ,धरती-गगन के त मन मोहबे करेला ,मनमोहन क भी मनमोह घलेला।

जब अर्जुन पुछलन कि ,कवने -कवने भाव में हम आपके देख सकीला ? कहँवा – कहँवा आपके दरसन हो सकेला ? तब लीलाधर क कहनाम रहल कि- जदि तू हमके नारी में ढूँढल चहबा त कीर्ति में,श्री में,वाक् में,स्मृति में,मेधा में,धृति में अउर क्षमा में देख लिहा।हम गावल जाय वाला श्रुति में बृहत्साम, छंद में गायत्री छंद, महीना में मार्गशीर्ष अउर रितु में बसंत रितु हईं। मतलब परमात्मा के उजाड़ -बीरान घर -संसार भा जड़-मुरदा इंसान में ना पावल जा सकेला।उनके त उहँवे पावल जा सकेला जहँवा जीवन राग-रागिनी से भरल- पूरल उल्लसित -आनंदित होखे। जहँवा बसंत क शुभता होखे अउर हिरदय क हुलास होखे।जड़-चेतन सबही क प्रिय बसंत रितु के अवते समूचा भारत उत्सव में आकंठ डूब जाला।बिबिध बरन क संस्कृति वाला देस सतरंगी हो जाला।होली क हुलास चहुँओर गुंजरित हो उठेला।भोजपुरिया माटी बौर क सुगंध से महमह महक उठेले ,कंठ से फाग बरबस फूट पड़ेला अउर झूम -झूम के खेत -सीवान हरसे-सरसे लगेला। फक्कड़ बनारस क अक्खड़  कवि (राहगीर जी )  भी आकुल -व्याकुल गा उठेला —

 

‘आइल बसंत रितु आइल रे ,हमरे दुवरा पर चाँन अगराइल रे।

जउवा के खेतवा पर चढ़ली जवनिया,

गेहुवाँ पर बरसल  सोनवाँ के पनिया,

बुटवा में तिसिया धधाइल रे, आइल बसंत रितु आइल रे।

हमरे दुवरा पर चाँन अगराइल रे।।

 

रितुराज बसंत के स्वागत -सत्कार में अइसने न जाने केतना मधुर -मनभावन लोकगीतन से पटल पड़ल ह  भोजपुरी लोक क भण्डार।ओही लोक-भण्डार में से कुछ गीत, कुछ कविता ,कुछ खिस्सा ,कुछ कहनी सहेजले समेटले , पुरखा पुरनियन कवि -कलाकार के रचनाकर्म के सिरमाथे लगावत, जस- कीर्ति गावत-बखानत, नित नव सृजन ,नव लेखन से आपलोगन के परिचित करावे के अपने संकल्प के दोहरावत ‘ भोजपुरी साहित्य- सरिता’ क बारहवाँ अंक आप सबके सोझा ह।साँच पूछीं त इ कुछ चंद लोगन क प्रयास ना बल्कि आप सबही क भरपूर सम्मिलित प्रयास ह कि पत्रिका आपन एक साल सकुशल पूरा क लिहलस। नेह-छोह बनवले रहब जा आ साहित्य -सरिता के अइसहीं समृद्ध करत रहब जा।

 

राउर आपन…..

  • डॉ. सुमन सिंह

असिस्टेंट प्रो.(अतिथि)

डी ए वी पी .जी. कॉलेज,वाराणसी

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