साधो देखो जग बौराना

‘ ए गुरु ! सुनला ह न कन्हैया क भाषण,का बोललस पट्ठा जानदार, शानदार, जबरदस्त।एकदम तबियत हरियर हो गयल।ए साह जी एहि बात प एगो स्पेशल चाय पिआवा भाय।’ नन्हकू कन्हैया कुमार क भाषण सुनके बहुत खुश रहलन अउर चाहत रहलन कि सबही ओ खुशी में लवलीन हो जाय बाकिर केहू नन्हकू क मन क साध पूरा करे के तैयार ना रहे।
‘हमके त कुल भाषण में एक्के गो बतिया निम्मन लगल ए नन्हकू।’ एक जाना के बोलते नन्हकू हुलस के लहरे लगलन –
‘कवन हो चच्चा ,तनी सुनी ?’नन्हकू ए तरे कान रोपले निहुरल सटल चल अइलन चच्चा के लग्गे कि सब हंसे लगल।
‘उहे,हमें भारत से नहीं भारत में आजादी चाहिए।का बात, का जज़्बात, का तेवर ह कन्हैया में।एकदम पोढ़-पक्कल राजनेता नियन।अइसने अध्यक्ष मिले के चाही हर छात्र-संघ के तब न देश क कल्याण होई।’ चच्चा क बात सुन के एगो पूर्व छात्र संघ के नेता के रह ना गयल।कुल क्रोध गुटखा पर कसत कहलन-
‘ ए भइया! खाली नीक-नीक भाषण देले से देस क कल्यान हो जात त एहि काशी में एक से बढ़के एक भाषण होला रोजे कहीं न कहीं। अइसन-अइसन वक्ता खड़ा क देब पांचे मिनट में कि बड़-बड़ जाना फेचकुर फेंक के चारो खाने चित्त हो जइहन।हमहनो क केहू से कम ना हईं जा जनला कि ना।’ अब नन्हकू के लगे लगल रहल कि जवने मुद्दा के जनमले खातिर सोहर गावे के चाहत रहल ह ओप्पर सोकगीत गावल जात ह।परेसान होके ऊ गुरु ओरी तकलन-
‘ ए गुरु देखा बतिया कहाँ से कहाँ पहुँच गईल।बतावा हम त अपने मन क बात कइलीं ह।इंहा त सब बहस-तेहस में पड़ गईल।’ नन्हकू क कुल कुलबुल-चुलबुल जल के कपूर हो गयल रहल।गुरु उनके तसल्ली देत कहलन-
‘ए बचवा ! मन क बात बस बतिआवे के ना चाही सुनहु के चाही।अब देश में आजादी चाही त इहो सोचे के चाही कि ई आजादी जाति-सम्प्रदाय से उप्पर हो।एक ओरी आरक्षण मांग के अदिमिन के बाँट दिहन लोग अउरी दूसरे ओरी सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय क नारा लगईहन।गरीबी, भुखमरी से आजादी भाषण दिहले से मिली आ कि ओ क्षेत्र में जूझ के काम कइलेसे।शिक्षा,समानता,समरसता प बस बहसबाजी कइले से का उ मिल जायी।अरे लड़हीं के ह त समूची मानवता खातिर एकजुट होके लड़े लोग कि इक्कीसवीं सदी में भी वाद के विवाद में पड़के नारेबाजी करिहन लोग।ए कुल प त हमहन क पुरखा कबीर छह सौ साल पहिलहीं कह गईल हउवन… साधो देखो जग बौराना, साँच कहे तो मारन धावे,झूठे जग पतियाना।त ए बचवा ए समय कुछुओ बोला,कहा कुल ब्यर्थ ह।जेके जवन उपद्रव करेके ह उ करेबे करी।तू ही बतावा के केकरे मन क बात सुनत ह अउर के केकरे मन जोग करत ह ?’ नन्हकू गुरु के लग्गे मामला सझुरावे गयल रहलन अउर अपनही अझुराय के रह गइलन।

  • सुमन सिंह

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