संघतिया

“काजी शादी में कवनो पुरान गर्लफ्रेंड अवतारी का , जे एतना सज तानी ? अतना त दूल्हा भी ना सवरीहे।” संजय के श्रीमती जी, टीबोली बोलली  ।  उ अपना बाल के डाई करत रहले। सबेरे से ही अपना साज सज्जा पर भिडल रहले।
“हम शादी में ना जाएब। ” संजय कहले।
“काहे के भरमावतानी। शादी में ना जाएब , फिर एतना श्रृंगार काहे करतानी ?” श्रीमती जी उनका बात के मजाक समझ के पूछलि।
“आज ऑफिस में जरूरी मीटिंग बा। ”
“मीटिंग और संडे के ? पहिले त कभी ना संडे के मीटिंग होत रहल ह और  एतना त कभी रउवा मेकअप  ना  करत रहनी ह ” उ फिर सवाल दगली।
उनकर बात सोलहो आना सच रहे।  मीटिंग त हमेशा होखे पर संडे के ना और  संजय कभी एतना न बन ठन के जास।  सच कहल जाउ त उनका तड़क भड़क से विरक्ति रहे। बिना शेविंग कईले , बिना अच्छा ड्रेस के उ अक्सर मीटिंग में पहुंच जास और ओकरा खातिर उनकर खिचाई भी होखे पर उ कबो ना सुधरले।
पर आज बात ही कुछ अइसन रहे की उनकर ख़ुशी और उमंग रोकात ना रहे। जिंदगी में अइसन ख़ुशी शायदे कबो मिलल होइ। पर अभी उ अापन ख़ुशी के राज केहु से बतवले ना रहले। अपना पत्नी के उ सरप्राइज देबे चाहत रहले।
“का पुलिस खान जांच पड़ताल करे लागेलू। एक बार कह देहनी  न, की ना जाएब। ” उ खिसिया  के कहले”तू बच्चा लोग के लेके चल जइह।
“पर जोशी जी के का जबाब देब ?” उ चिंता से कहली “जब रउवा ना जाएब उनका लड़िका के शादी में त रउवा लड़िका के शादी में के आई।  परदेस में अब इहे लोग न भाई पट्टीदार बा।
“हुह ” संजय मन में कहले “बुझाता हमनी के गाव नईखे जे लईका कुल के शादी एइजा  करेब  जा। ”
“तू समझा दिह। ”
“ठीक बा। ”
संजय वापस अपना डाई में बिजी हो गईले।
वैसे त आदमी के जिंदगी में खुश होखे के तमाम अवसर आवेला और संजय के जिंदगी में भी आईल रहे पर आज के ख़ुशी बिलकुल अलग और खास रहे। आज उ पच्चीश साल बाद एगो बिछडल संघतिया से मिले जात रहले।
रमेश, इहे नाम रहे संघतिया के। तब संजय करीब ग्यारह साल के होईहे जब रमेश से उनका पहिला मुलकात भईल रहे।  दुनू जाना छठवी के क्लास में नया स्कूल में आयिल रहे लोग। मुलाकात त पहिलका दिने ही हो गईल, पर रमेश से उनकर परिचय भईल पंद्रह अगस्त के ।  ओइदिन स्कूल में झंडातोलन के बाद तमाम तरह के कार्यक्रम रहे। संजय  लेखन के बड़ा शौक रहे और ओतना कम  उम्र में ही गुरूजी लोग उनका लेखनी के बहुत तारीफ करे लोग ।  आम चलन के उलट उ भोजपुरी में लिखस और ओकरा खातिर उनकर हिंदी के गुरूजी प्रेरित करस। वैसे उनका स्कूल में भोजपुरी के पढ़ाई ना होखे। उ देशभक्ति पे भोजपुरी में कहानी लिख के सुनवले रहले। दूसर  छात्र कुल भी  कार्यक्रम प्रस्तुत कईले रहल सन पर संजय के पूरा भरोसा रहे की पहिला पुरस्कार उनका ही मिली। सबसे अंत में रमेश के गाना रहे।  ओइदिन  उनके पता चलल की रमेश गाना गावेले। पर अतना बढ़िया , इ त  ओइजा मौजूद केहु ना सोचले होइ।
भोजपुरी राष्ट्रभक्ति गीत के अइसन शमा रमेश बन्धले की सब केहु भावविभोर हो गईल ।
“देशवा के लाज बचइह मोरे भैया। ”
इ गाना सुन के शायदे केहु बचल जेकर  आँख  ना गिल भईल। अइसन लगते न रहे की कवनो ग्यारह साल के लईका गावता।

निर्विवाद रूप से रमेश के पहिला पुरस्कार मिलल और संजय के एकर तनिको मलाल ना रहे। ओइदिन से ही ओ लोग के दोस्ती के नीव पड़ल। रमेश के गायकी पूरा जवार में मशहूर हो गईल और पूरा स्कूल में ओ दुनू जाना के मिताई।
फिर कुछ दिन बाद जब महावीरी पूजा आईल त रमेश के गावल गाना “लाली लाली सेनुरा पोतले सगरो बदनिया इ हनुमान हउवे ना।  ” जवार के बच्चा बच्चा के जुबान पर छा गईल।  ई दौर ही अइसन रहे जब बच्चा से लेके बूढ तक साफ़ सुथरा गाना या भक्ति गाना गावे लोग।  अश्लीलता के कही नामोनिशान ना रहे।  रमेश के भोजपुरी के बहुत बड़हन गायक बने के सपना रहे और माई सरस्वती उनका गला में मौजूद रहली।  रमेश के सपना एगो बड़का भोजपुरिया साहित्यकार बने के रहे।  एतना विस्तृत भोजपुरिया क्षेत्र भईला के बाद भी भोजपुरी साहित्य के आभाव रहे।  नात स्कूल में एकर पढ़ाई होखे ना केहु भोजपुरी लिखे।  गीत संगीत त फिरभी ढेर संख्या में मौजूद रहे। रमेश संजय के भोजपुरी गीत लिखे  के प्रेरित करस और फिर ओ लिखल गाना के गावस। आगे चल के सुनहरा भोजपुरिया क्षेत्र के सपना देखे लोग।
इहे सब करत साल भर के समय कईसे बीतल पता ना चल पावल और फिर अचानक रमेश के पापा के नौकरी विदेश हो गईल।  उ सपरिवार विदेश चल गईले। कुछ दिन बाद संजय  के पापा के भी तबादला हो गईल।  कुछ दिन ले त दुनू जानाचिठ्ठी के माध्यम से संपर्क में रहल लोग ।  ओ घरी चिठ्ठी ही एकमात्र जरिया रहे संवाद के और विदेश से संवाद कईल आसान ना रहे।  धीरे धीरे चिठ्ठी पत्री बंद हो गईल।  जिंदगी आगे बढ़ल, नया दोस्त मिलल सन  पर संजय कभी रमेश के ना भुलईले।  हमेशा उनकर दिल में उ साल भर के गुजारल वक्त ताजा रहे और भगवान से हमेशा प्रार्थना करस की रमेश से मुलाकात हो जाउ।
पढ़ाई लिखाई के बाद संजय  अपना भोजपुरी रचना के छपवावे के  बहुत प्रयास कईले पर  कुछ खास सफलता ना मिलल और जिंदगी के गाडी आगे सुचारू रूप से चलावे खातिर उ  मुंबई आ गईले कमाए।
आजकल फिर से उनकर भोजपुरी प्रेम जागल रहे और उ आपन  कलम उठवले रहले।  अब लेखनी उनकर खाली  शौक ही ना बल्कि मुहीम रहे।  ऐ पच्चीश साल में भोजपुरी के रंग एकदम विकृत हो गईल रहे।  जगह जगह अश्लीलता फाइल गईल रहे और एहि के सफाई खातिर उ कुछ दोस्तन के साथै ऐ मुहीम  पर रहले।
एक हफ्ता  पहिले रमेश के अचानक फ़ोन आयिल रहे। उहो ऐ पच्चीश साल में संजय के ना भुलाईल रहले और हमेशा उनका बारे में छानबीन करत रहले। संजय के बारे में उनका  सोशल नेटवर्किंग साइट से पता चलल रहे। काफी देर तक दुनु संघतिया लोग पुरान बात कुल याद कईल लोग। संजय के बार बार पूछला पर भी रमेश उनका के अपना बारे में ना बतवले।  हां एतना जरूर बतवले की अब उ भोजपुरी के बहुत बड़हन स्टार बाड़े।  उनका आपन मंजिल मिल गईल बा। पर उ संजय के सरप्राइज देबे चाहत रहले ऐ वजह से बाकि सब मिलला पर ही बतइहे। एक हफ्ता बाद उनकर मुंबई में शो रहे। पूरा फैमिली के साथै शो में आवे के संजय के इन्वाइट  कईले। दू दिन बाद संजय के vip गैलरी के पास डाक से  मिल गईल। शो के ही दिने उनका पडोशी जोशी जी के लईका के  शादी रहे ऐ वजह से पूरा परिवार के गईल संभव ना रहे। पर उ ना जास एकर त सवाल ही न रहे। ओइदिन से लेके आज तक के समय के संजय बेसब्री से  कटले  रहले।  इ जानके के की रमेश भोजपुरी के बहुत बड़हन गायक बन गईल बाड़े , संजय के अथाह  बल मिलल रहे। अश्लीलता और फुहरता  के खिलाफ जवन अभियान उ लोग चालू कईले रहे लोग अब ओकर सफलता उनका सामने लउकत रहे।
बस  एक ही चीज खटकत रहे। इंटरनेट पर हज़ारन बार खोज कईला के बाद भी  रमेश के बारे में  कवनो जानकारी ना मिलल रहे। एतना बड़हन स्टार और ओकरा बारे में कवनो जानकारी मिलला से संजय के मिले के व्यग्रता और  बढ़ गईल रहे।  रमेश से मुलाकात के बात संजय घर में ना बतवले रहले।  उ अपना परिवार के सरप्राइज देबे  चाहत  रहले।
रमेश के शो शाम आठ  बजे से रहे पर संजय के उनसे मिले के एतना बेचैनी रहे की उ ६ बजे ही शो वाला जगह पर पहुंच गईले।  मन में तमाम तरह के बात चलत रहे। सबसे पहिले “लाली लाली सेनुरा पोतले ” गाना सुनावे के फ़रमाईश करेब। जब रमेश के पता चली की भोजपुरी के साफ़ सुथरा करे खातिर उ अभियान चालवतारे त  उ केतना खुश होईहे। उनके लेके जगह जगह शो कईल जाई।
रमेश के लोकप्रियता के अंदाजा एहिसे लगावल जा सकत रहे की पूरा सीट दू घंटा पहिले ही भर गईल रहे। vip पास के वजह से उनका के  सबसे आगे वाला सीट पर जगह मिलल रहे। सपना के दुनिया से बाहर निकल के जब उ  मंच  और चारु तरफ के पोस्टर देखले त मन  थोड़ा फीका हो गईल। पोस्टर में त  सब अश्लील और फुहर गावे वाला जवन की आजके सुपरस्टार रहल सन ओकनी के फोटो रहे।  सबसे बड़का फोटो निर्लजवा के रहे।  वैसे निर्लजवा के फ़िल्मी नाम कुछ और और ही रहे पर ओकर फुहर और अश्लील गाना गावे  के वजह से उ और उनकर संघतिया लोग ओके निर्लज्वा बोलावे लोग। एक बार उनका लागल की कही गलत जगह पर त नानू आ गईले। पास पर लिखल एड्रेस के दुबारा चेक कईले। उ त ओहिजा के रहे। पर रमेश ओ कुल के साथै गईहै  इ त उ सपना में भी ना सोच सकत रहले। सूरज एक बार पूरब से पश्चिम निकल सकत रहले पर रमेश जइसन संस्कारी आदमी ओइसन घटिया कुल के जमात में खड़ा होइ इ त सोचल भी असंभव रहे।  कुछ त गड़बड़  रहे।  बहुत देर तक सोचला के बाद भी जब उनका समझ में ना आयिल त उ बगल वाला दर्शक से पूछले।  उ  निर्लज्वा के बहुत बड़हन प्रशंशक रहले।  बीस हज़ार में उ टिकट खरीद के  आयिल रहले निर्लज्वा के प्रोग्राम देखे। टिकट के दाम जानके संजय के अपना संघतिया पर बहुत गर्व भईल पर बगल वाला के बात सुनके त उनका पैर से जमीन ही सरक गईल। उनका अपना कान पर विश्वास ना होत रहे।  उ एकहि सवाल कई बार पूछले और जबाब में उ दर्शक निर्लज्वा के बचपन से लेके आज तक पूरा जीवन कथा सुना देहलस।
निर्लज्वा और कवनो ना बल्कि उनकर बचपन के संघतिया रमेश ही रहले। रमेश और अइसन घटिया फिल्म के नायक और अश्लील गाना के गायक।  पर सच्चाई इहे रहे।संजय खातिर त इ बहुत पीड़ा के बात रहे। केतना गलत सोचत रहले उ।  गन्दा से गन्दा साफ़ करे के उ सपना देखत रहले।  घडी पे नजर डलले त सात बज गईल रहे।  रमेश के आवे में अभियो के घंटा रहे पर संजय के मन उचट गईल रहे।  एक सेकंड भी ओइजा रहे के उनकर इच्छा ना रह गईल और उनकर उ जगह भी त ना रहे।  इ त उ मंच रहे जवना के खत्म करे के उ सपना देखले रहे और ओकरा प्रयास में लागल रहले। फिर ओहि मंच पर उ कईसे रह सकत रहले।  उनका त ओईजा से जााही के पड़ी। पर उनका दोस्ती के का होइ।  जवना दोस्त से मिले के उ पच्चीश साल तक तड़पले अब ओईसे ना मिलिहे ।  केतना बेसब्री से उ ऐ दिन के इन्तजार कईले रहले और संघतिया से मिले बिना ही चल जईहे।  फिर रमेश के फ़ोन आई त का जबाब दिहे।  कवनो बहाना बना दिहे पर कब तक। आज ना त काल्ह इ बात त सामने अईबे  करी की कभी एक साथै हिलोर मारे वाला दुनू जाना अब नदी के विपरीत किनारा पर खड़ा बा लोग। दोस्ती बहुत बड़हन चीज होला पर एतना  बड़हन भी त ना की माई के छोड़ दिहल जाउ। ओकरा से भी बड़हन बात त इ रहे की का रमेश केहु के संघतिया बने रहे के काबिल रहले भी  अब।  उ त आपन और करोडो लोग के माई के रोड पर लिया के नंगा क देले रहले।  अपना नाम खातिर माई के बेच देले रहले।  का अइसन आदमी केहु के संघतिया हो सकेला।  हरगिज ना।  रमेश जइसन आदमी ना अब केहु के बेटा बन सकत रहे ना संघतिया।  संजय निर्णय ले लेहले। माई के कीमत पर दोस्ति ना रखेब।
उ ओइजा से चले के फैसला क लेहले।  चले से पहिले उ रमेश के सन्देश भेज देहले – ” दोस्त अब तू केहु के संघतिया बने के काबिल नईख।  पहिले माई के घरे लियाव ओकरा के इज्जत द, फिर हमनी के मिलल जाई। ”
“मीटिंग जल्दी खत्म हो गईल बा। शादी में हमहू आवतानी। ” अपना श्रीमती जी के इ  सन्देश भेज के उ शादी में जाए खातिर टैक्सी पकड़ लेहले।

  • धनंजय तिवारी

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