शेष भगवान जाने ——-!!

का जमाना आ गयो भाया, टँगरी खींचे के फेरा में ढेर लोग अझुराइल बाड़ें। उहो काहें बदे, एकर पता नइखे, बस खींचे के बा, सरेखल बा लोग आ आँख मून के खींच रहल बा। आगु चलिके एकर का फायदा भा नोकसान होखी, एकरा ला सोच नइखे पावत। आला कमान के कहनाम बा, सेकुलर दादा कहले बाड़ें, एही सब के चलते हो रहल बा। अब भलही टँगरी खींचे के फेरा मे खुदे गड़हा गिर के कनई मे लसराए के परत होखे। ओहमे कवन सुख मिल रहल बा भा आगु मिली,पता नइखे। मने गुलामी के जीयल आदत बनि चुकल बा भा गुलामी खूने मे मिलल बा। कुछ लोग त बन्नी-बख़रा लेके टँगरी खींचे मे जुटल बा। बुझता कि मनरेगा के काम मे लागल बा। 100 दिन के काम के अधिकार के जी रहल बा। का अबहिओ लोग सावन के आन्हर लेखा सगरों हरियरी देख रहल बा? सोचत-देखत-सुनत कपार पीराये लग रहल बा। कबों-कबों त इहो लागेला कि कुछ लोगन खाति कुछों करे के बा,एही से क रहल बा, वाली स्थिति-परिस्थिति मे जीयला के नियति बनि चुकल बा। बुद्धि के भसुर लेखा,दिमाग के खिड़की-केवाड़ी बन्न क के लागल आदत बनि गइल बा। दिमाग के कोठरी भूस भरल होखे भा गोबर कहल नइखे जा सकत। बाकि कुछ अइसने भरल बा, ई तय ह।

अपना घर मे, अड़ोस-पड़ोस मे भा कह सकेनी चौहद्दी मे एह घरी इहे चल रहल बा। कुछ लोग खाति त कबड्डी के खेल नीयर लागे लगल बा। रोजे साँझ-सबेरे जइसे खेलही बा, नाही त खर-सेवर होखला के डर बा। कई लोग त पेनी के ज़ोर लगा के लागल बा।कुछ लोग देखी-देखा लागल बा। फलाने टँगरी खींच रहल बाड़े,त हमरो के खींचे के चाही, एही से खींचे में लाग गइल बा लोग। कुछ लोग त जात-धरम के चक्कर में खींच रहल बा। मने खींची-खींचा के चकरी घूम रहल बा। सोच के दीन-दुनिया से कगरिया के अर्जुन लेखा चिरई के एक आँख फोरे में लागल बा। एहु में पहिले हम त पहिले हम वाला वाइरस घूसि गइल बा। एंटि वाइरस के खोजे में लागल बा कुछ लोग। दुकानदार लोग एंटि वाइरस खोजे वालन के टँगरी खींचे लाग गइल। पुरनकी कहाउतिया लेखा कुछ लोग बहती गंगा मे हाथ धो रहल बाड़े।

कतों-कतों जलसा मनावे के मुहुरत निकल गइल बा। अब सुतलको लोग आँख मीच-मीच के बहरा उपरा रहल बा। एगो नया खेल शुरू होखे जा रहल बा। झूठ-साँच वाला,कुछो बोलीं,कवनो आरोप लगा देही केकरो पर, सही-गलत के निर्णय होखे में त लुटिया डूब जाई, फेर भलहीं बेदाग बारी हो जाय। नाटक-नौटंकी चली,खूब देखबो करी लोग,देखते देखत आपुस मे लड़ियो जाई लोग। सिर फोड़उवल-मुँह नोचउवल आपुसे मे करी,उहो ओकरा खातिर जे ओकर कबों ना रहल। नया-नया गोल कबड्डी खेले खाति सोझा आई,कुछ लेही देही फेर पटा जाई। कुछ लोग गड़लका मुरदा उखाड़ी, जे आज ले गरियावत फिरत रहल ह, अब मीठ बोली बोले के परयास करत मिली। एह जलसा के फेरा मे जे सोझा मुँह बातो ना करत रहल, उहो अब बतीसी देखावत मिल रहल बा। मनई चकचिहाइल बाड़े, एह कुल्हि लीला के देखि-देखि के।

नवका भोंपुओ नरेटी फार-फार के चिचियाइल शुरू क देले बाड़न सन। बाकि भोरे से साँझी तलक कई कई बेर पाला बदल लेत बाड़न सन। जेकर चाह जेतने मीठ ओकरे खाति ओतने ज़ोर से चिचियात बाड़न सन। ई कुल्हि देख-सुनि के मौसम विज्ञानी लोगन के माथा चकरिया रहल बा। पूर्व आकलन वाला हिसबवो घचपचा गइल बा। बुझाते नइखे कवन डाटा दिआव आ कवन न दिआव?कई गो नया धंधा शुरू हो चुकल बा। दुकान साज रहल बानी सन। गहकियों कूल्हिए दोकाने पहुँच रहल बाड़े। एकही समनिया के अलग-अलग दोकान मे अलग-अलग दाम बा। अपना-अपना औकात का हिसाब से सब दोकान अउरी गहकी मसगूल बाड़न सन।

पंडीजी पोथी-पतरा आ हीरामन तोता लेके दरी बिछा के सड़की के किनारे भोरहीं से रोजे डट जात बाड़ें।पंडीजी केकरो पोथी देख के आ केकरो हिरामन तोता से परची निकलवा-निकलवा के मजमून बाँच-बाँच के सुना रहल बाड़ें। एक ओरी गर मे लंगोट लपेटले नवहा लोग कुछ गिटिर-पिटिर क के गंहकी जोड़े के फेरा मे अझुराइल बुझात बाड़े। डिजिटल प्रोमोसन के पहाड़ा पढ़ा रहल बाड़े आ आपन गोटी बइठावे के फेरा मे जबरी मुस्कियात मने मन गंहकियन के गरिया रहल बाड़ें। टेरो कारड वाली दोकनियाँ मे ढेर धसोड़ के गंहकी ठाढ़ देखत बाड़न। आम मनई सभके ला “पूतवो मीठ-भतरो मीठ” वाला सिद्धान्त के कमरी ओढ़ि के मुस्कियात समय के फेरा देख रहल बा। बस इहे करम ओकरा किस्मत मे बा, शेष भगवान जाने।

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

Related posts

Leave a Comment