लोग कथी कहिहें

सभ परेशान बाटे लोग कथी कहिहें।
बेंवत तलाशे ले कि मट्ठा कइसे महिहें।
बाबूजी के राज रहे खूब रहे चलती।
अस्सी बीघा जायदाद दस बीघा परती।
पौनी लो के मिलत रहे अगऊँ निकाल के।
बोझा-पंजा अलगे दियात रहे साल के।
बखरा – बँटाई भइले खेत भइल काठा।
ताके ला लो दूध बदे मिले कहाँ माठा।
दादाजी के बरखी में दस कोस खा गइल।
बाबूजी के बरखी में बिगहा नपा गइल।
पूछले कन्हैया, ” भई, काहे ई तबाही बा? ”
मिलल जवाब ई- “असहीं बाहबाही बा?
बिना मेलजोल के समाज कइसे रही?
ओजल परोजन प लोग कउची कही?”
जबले जजात बाटे तबे ले ई ठस्सा बा।
खाली भइले हाथ त खाहूँ के दुरदसा बा।
अइसन समाज के बदलले के काज बा।
मिलीजुली रहले में सबहीं के नाज बा।

  • कन्हैया तिवारी “रसिक” 

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