लोक संस्कृति के अजब नजीर – जबरी पहुना भइल जिनगी

-लाल बिहारी लाल

भोजपुरी भाषा आज देश दुनिया में आपन परचम लहरावे मे काफी आगे बा। एह करी में रोज नया-नया लेखक लोग के कविता आ कहानी के संकलन खूब बाजार में पाठक खातिर आवता। हाल फिलहाल में भोजपुरी के लेखक मंच पर एगो नया नाम उभरल ह जोकर नाम ह- जे.पी. दिवेदी। दिवेदी जी के ई खासियत बा कि उहां के ठेठ भोजपुरी में ही कविता आ कहानी लिखेनी।इनकर पिछला साल एगो कवित संगरह पीपर के पतई आइल रहे ओकरा बाद एह साल के शुरु में आइल ह- जबरी पहुना भइल जिनगी।ई संकलन मैथिली भोजपुरी अकादमी, दिल्ली  के सहयोग से हर्फ परकासन परकाशित कइले बा। जे में कुल 72 गो कविता/गीत बा।

एह संकलन में गीत आदरा से बादरा से शुरु होके होरी में मन फगुआसल बा..पर खतम भइल बा। आगे अँखिया निहारे ले राह में कवि लिखले बा-

अइसन रितु काहे भेजल हो दइबा

कि हियरा में निकसत बा आह…।

कवन समरसता में निर्गुन के भाव बा –

सभे  बोलता विरही बचनिया हो रामा ,

कवन समरसाता।

कवि हंसी पर कहता कि इंसान के हंसी चेहरा से गायब हो गइल बा। काहे  कि आज हर आदमी भागमभाग में लागल बा।उहई भाईचारा पर तंज कसत कहतानी-

कहवा मोर दलान

आधुनिक युग में महल आ अटारी पर आटारी ,कोठा बनल जाता पर दालान नइखे जाहवां बईठ को चारी गो लोग आपन सुखदुख कह सुन सके।उहई बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर तीखा ब्यंग्य रुप मे कहतानी –

खाली नारा में बेटी बचावल गइल..

बस शहर दर शहर आउऱ पोस्टर लगावल गइल।

आजकाल गांव भी पूरा कंकरीट में बदलल जाता पर कहतानी गउंआँ हेराय गइल , आपाधापी में सब कुछ बिलाय गइल। भाईचारा के रस्म गांव मे होली के समय ही थोड़ा बहुत देखे के मिलता बाकी कुल जगहा त गोल हो गइल बा। संगरह के शीर्षक रचना जबरी पहुना भइल जिनगी में पहुना के कई गो रुप बा..रउआ बुझत रही..। उहई पेज 47 पर वर्तमान ब्यवस्था पर कहतानी की

दरदिया दिहलस रे मोदीया…..

कही पे निगाहे आउऱ कही पे निशाना के तहत तंज  लिखल गइल बा।

एह संकलन में  प्यार- मोहब्बत ,रिश्ता- नाता के बानगी कई गो रचना में अलग-अलग रुप में  देखे के मिलल बा।सामाजिक सरोकार आ लोक संस्कृति से भरल परल उदाहरण बा ई संकलन में। दूसरा भाषा में कहल जा सकेला कि जबरी पहुना  भइल जिनगी लोक संस्कृति के अजब नजीर बा ।

साइंस के विद्यार्थी साहित्य में आवेला  त हमार लिखल  लाइन किस्सा लेखन के ईयाद आवता –औऱन के बेवफाई ,गम के समुंदर आ उल्फत के पहार लेके जे खरा हो जाला, उहे कवि चाहे लेखक हो जाला-(लाल बिहारी लाल)। पति- पत्नी प्रेमिका-प्रेमी के वियोग  से ले के संजोग पर भी कई गो कविता/गीत बा।लेखक के परकीरति परेम भी कहीं-कही छलकत बा। जेकर रसपान पाठक के जगे-जगे करे के मिलता। कुल मिला के  ई जबरी पहुना भइल जिनगी भोजपुरी क्षेत्र में आपन एगो अलग मुकाम बनावे में सफल होई अइसन हमार  उम्मीद बा। कवि आ परकासक के हमरा ओऱ से बहुत-  बहुत बधाई जे आपन आपन माई भाषा पर कलम चलवलक आ संगरह परकासित भइल।

काब्य कृति- जबरी पहुना भइल जिनगी

कवि- जे.पी. दिवेदी

प्रकाशक-हर्फ प्रकाशन ,नई दिल्ली

मूल्य- 200 रु., वर्ष -2018

समीक्षक-लाल बिहारी लाल

(वरिष्ठ कवि,लेखक एवं पत्रकाऱ)

 

Related posts

Leave a Comment