लोकतन्त्र पर खतरा बाटे

रोज पतन के जतरा बाटे

लोकतन्त्र पर खतरा बाटे ॥

 

अइसन लोग कहल, हम सुनली

बइठी उहाँ मन ही मन गुनली

अललै पीये गंगा तभियो

नीमन बूझ उनही के चुनली ।

 

जीत भइल सतभतरा बाटे

लोकतन्त्र पर खतरा बाटे ॥

 

कब का सही, गलत कब उहे

भेंटला पर भर नीमन कहे

परी जरूरत सब कुछ चिक्कन

पहिले त सब बाउर रहे ।

 

साँचो! ससुर छनमतरा बाटे

लोकतन्त्र पर खतरा बाटे ॥

 

कीनी खरीदी चोर उचक्का

चमक धमक मे बा जे पक्का

करिया करिया सुटकेसन से

रोज लगी जनता के धक्का ।

 

अब ना मिलत गड़ितरा बाटे

लोकतन्त्र पर खतरा बाटे ॥

 

खउलत ले विष गगरी घूमे

बेर – बेर बस कुरसी चूमे

दुलुम भइल ओकरा के छोड़ल

आपन  देख सियासत झूमे ।

 

जूटि बनावत सतरा बाटे।

लोकतन्त्र पर खतरा बाटे ॥

 

बिरह गरभ मे जोड़ तोड़ के

रसरी बरल धूरी कोड़ के

नीति नियंता रोज बरतिहें

नेह के घइला फोड़ फोड़ के।

 

फेल भइल सब पतरा बाटे

लोकतन्त्र पर खतरा बाटे ॥

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

 

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