रंग फागुन के

रंग फागुन के जीवन में घोलीं सभे,
प्रेम के पर्व ह, खेली होली सभे ।
 
एह, में नइखे उमिर के बंधन कहीं,
जात-धरम के ना कवनो बाधा कहीं ।
तन-बदन एकरा में डुबोलीं सभे,
प्रेम के पर्व ह, खेली होली सभे ।
 
एह में घोरल, पुरूखन के आशीष बा,
संग में जोरल, परिजन के संदेश बा ।
लेके आशीष शुभ -शुभ बोली सभे,
प्रेम के पर्व ह, खेली होली सभे ।
 
देवता -देवी के एकरा में वरदान बा,
मेल-जोल-एकता के अभयदान बा ।
एक हो जायीं फिर, हमजोली सभे ।
प्रेम के पर्व ह, खेली होली सभे ।
 
देश से दूर दुनिया में, गइल होली,
जे मिलल राह में , ओकर भइल होली ।
गांठ मन में बनल आज, खोलीं सभे ।
प्रेम के पर्व ह, खेली होली सभे ।
 
  • संजय चतुर्वेदी

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