मिलन समारोह

गाँवे एगो बरात आइल

राते बिआह भइल

जनवासा रखाइल रहे

तीन पहरी के लइका खिचड़ी खइलस

फेर बिदाई के बेरा नियराइल

एक जने मन परवने

गुरु अबहीं त मिलनी ना भइल ।

 

फिर मिलनी के तइयारी भइल

घराती-बराती सोझा बइठने

पारी पारी एकहक जने दूनों ओरी से खाड़ होखेँ

गरे मिले, ज़ोर अजमाइस करें

फेर अपना जगह बइठ जाँय

कुछ ले देके परम्परा निभावत।

 

अगिला जने घराती के ओर से खाड़ भइने

त एक जाने बोलने

ई ! गुरु हउवन

फेर बराती के ओर से एक जने खड़ा कइल गइने

पाछे से आवाज आइल

ई ! महागुरु हउवन

घराती ओर से आवाज आइल

ई बहुत चेला बनवले बाड़ें

फेर बराती ओर से आवाज आइल

महागुरु ओही चेलवन के आपन पट्टा पहिनवले बाड़े।

 

दूनों लोग मिलल फेर बइठल

अबकी बेर घराती के ओर से

एक जने मिले खाति उठने

पाछे से आवाज आइल

ई! सावन बाड़े ‘हरदम हरियर’

बराती ओर से एक जाने हुमच के खाड़ भइने

फेरु आवाज आइल

ई! फागुन बाड़ें हरदम रंगीन।

 

एकही संगे कई गो आवाज आइल दूनों ओर से

होवे देही जमके

सावन फागुन के मिलन समारोह

लगे देही ठप्पा

कुल्हि अपने बा

जवार से लेके सरकार तक।

 

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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