मजदूर दिवस के कइसे देहिं बधाई

निक मजूरी के चलते छूठ गईल गउवाँ ।
हित नात कुल छूटल भूलाइल पुरखन के नऊवां ।।
गावँ के बनिहार के, शहर मजूर बनवलस ।
निक मजूरी भेटाई इहे हँस के बतवलस ।।

काम क घंटा यहां तय बा ये भाई ।
चाहे तपे सुरुज चाहे चले हवा हरजाई ।।
होते सबेर लोगवा कारखाना और धऊरता ।
सपना होइ पूरा सोच आस के फुलवा मऊरता ।।

बचवन के निक शिक्षा भेटाई ।
गरीबी के नाँव ई शिक्षा ही मिटाई ।।
दवाई किनाई जवन माई के जिनगी बढ़ाई ।
बाबू के चश्मा लागी, होइ बेटी क पढ़ाई ।।

थसकल पलानी भी सुधर जाई भाई ।
गऊ बन्हा जाव ठनले बिया माई ।।
दूध दही मिली त सुधरी बुढ़ौती ।
बबुवा के स्वागत बा भर के कठौती ।।

इहे अरमान करम करेके उकसावेला ।
थकला के बादो ध के बाहँ उठावेला ।।
कांच पाक बनाई खा आदमी धावेला ।
आपन करम के फल सबहिं पावेला ।।

परिजन क जिम्मेवारी जिनगी के बाती जरावेला ।
खूब मेहनत करेके जज्बा जन्मावेला ।।
मेहनत के बादो आदमी थाकेला नाहीं ।
खराब रहन क ओर ताकेला नाहीं ।।

झूठ फरेब ओके नाहीं मन भावे ।
मेहनत ईमानदारी के गीत ऊ गावे ।।
दुखियारी के पुकार ओके पहिले सुनाला ।
ओकरे ओट से हुक्मरान लोग चुनाला ।।

@ तारकेश्वर राय “तारक”

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