भुनेसर भाई के ठेकुआ

जिउतिया आवे से महिना भर पहिले से ठेकुआ के नाम जपत बाड़े भुनेसर भाई. काल जिउतिया त बित गईल लेकिन सोमेशर भौजाई एके ठेकुआ माने कि खाली ओठंधन से ही भेंट होखे देले बाड़ी भुनेसर भाई के. बाकी ढ़ेरे मनी ठेकुआ बना के सिकहर पर धर देले बाड़ी कि भोरे जेतना मन करी, खा लेम.

भुनेसर भाई के रात कटले नईखे कटात कि कब भोर होखे आ ठेकुआ के भोज कईल जाव. उ आँख खोलत बाड़े तबो भा बंद करत बाड़े तबो आँखीं के सामने ठेकुए लउकत बा. हमरा लागत बा कि दूई चार साल बीतला के बाद भोर के चार बजल रहे ओह दिन. मुर्गा बांग ना देले रहे लेकिन भुनेसर भाई के संतोष जवाब दे गईल रहे. ना हाथ धोवले ना मुँह आ पहुच गईले चुहानी में. सिकहर पर हाथ ड़ालत बाड़े त का, बरगुना तs खाली बा. एको ठेकुआ के आता पाता नईखे. भुनेसर भाई के त दूनो जहान हिल गईल.

दूनो हाथ से माथा पकड़ले, धमाक से जमीन पर बईठ गईले. हमार धन प ड़कईती. आज जे चोर भेटा गईल न त दूनो हाथ आ गोड़ फरिके फरिके कईले बिना ना छोड़ेम. तब ले जमीन में कुछ खुरू खुरू लेखा बुझाईल. सारा खिसा एक मिनट में बुझ गईले भुनेसर भाई. ले अईले कुदारी आ कोड़ देले चूहानी. तेरह में से जोड़ जाड़ के कुल एगारह  गो ठेकुआ बरामद क ले ले आ पानी से धो के बईठ गईले जिमे.

 

जब सोमेशर भौजाई उठली त चूहानी हर बैल से जोतल देख कपार पीट ले ली. अगिला दुआरी प भुनेसर भाई माटी में लेटाईल  पोटाईल ठेकुआ पावत रहले त पूछ देली  ई का कईनी भुनेसर बबुआ. हँसत बाड़े भुनेसर भाई. “मजाल बा केहू के, जे भुनेसर के ठेकुआ ले के भाग जाई.” आ देखते देखत कुलि ठेकुआ पा गईले भुनेसर भाई. ई दोसर बात बा कि आगिला दस पनरह दिन दवाई बीरो चलल. लेकिन आजो कहे से मानत नईखन कि “मजाल बा केहू के, जे भुनेसर के ठेकुआ ले के भाग जाई.”

✍–” विशाल नारायण ”

 

 

 

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