बेमारी

बलमा बढ़ जाए आगा, मोहे  टारी  ए  सखी,

जब से धइले बा फेसबुक के बेमारी ए सखी ।

 

आधी-आधी   रतिया  ले   नेटवा  चलावेला,

अपने   ना   सुते  संगवे   सभे-के  जगावेला।

टीना जस  गरम होखे  बिपती भारी ए सखी,

जब से धइले बा फेसबुक के बेमारी ए सखी ।

 

बेरि-बेरि बाजे  टुन-टुन  कबहीं  थरधराला,

बड़का भिनुसहरा  ले जानू काथी  जोहाला ।

नित भहरत  बा  नाता  के  दोचारी  ए सखी

जब से धइले बा फेसबुक के बेमारी ए सखी ।

 

आँख धंसि जोत घटी  दरद  बढ़ी  पीठी  के,

मेल मैसेज  कबहीं ना  परतर  दी  चिट्ठी  के ।

मानस  ना   पैणाली  छूटी  इयारी  ए  सखी,

जब से धइले बा फेसबुक के बेमारी ए सखी ।

 

  • दिलीप पैणाली

सैखोवाघाट

तिनसुकिया

असम

 

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