बेगानी शादी मे अब्दुल्ला दीवाना

का जमाना आ गयो भाया , “बेगानी शादी मे अब्दुल्ला दीवाना” कूल्ही ओर फफाये लागल बाड़न सs। पतरी पर छोड़ल खइका खइला के बाद जइसे कुकुर अइठत चलेलन सs, ओइसही इहवों ढेर लोग चल रहल बाड़ें । का कहीं महाराज , दोकान – दउरी बन्न होए के अपसगुन देखाए लागल बा । फेर त “उपास भला कि पतोहू के जूठ” , जियल जरूरी बा त पतोहिया क जूठवों के साफ आ मीठ बुझही के परी नु । खइला के बाद पतोहिया के गोड़वों पुजही के परी नु । पुजाइयो रहल बा । ओकर त असवारी भेज के , दुवरे बोलवा के , माथो चुमा गइल । पाता नाही कनवाँ मे का का फुंकाइल होई , के जानत बा । जइसे बरात मे बजनिहा नाचेलन, ओइसे इहवों कुछ लोग नाच रहल बाड़े । ऊ त सभे ले ढेर लहालोट होके नाच रहल बा , जवने के माथे मउर चढ़े के आज ले साइतो ना देखाइल । अब चाहे शंकर जी के बेल पत्तर चढ़ाई भा कवनों गुरुद्वारे जाके माथा टेकीं चाहे कवनों मजार पर अरदास करी, माथे मउर चढ़ल मोसकिले बा । जेकर पलिवार जिनगी भर कटुवई कइलस, भला ओकरे माथे मउर, ना बाबा ना । के भाड़ी आपन कनिया , केहू ना । जेकरे गोड़तार आ मुड़हर के पता नइखे, बतावा भला ! उहे मसहरी साले आ गइल ।  फेर त साइत बनले बनल बा ।

सुने मे आवता कि कुछ लोग कुचिला के खेती करे जा रहल बाड़ें । उ लोग खेती जोग जमीनों देख लेले बा । दू  कियारी मे उगा के सवादो ले लीहले बाड़ें । फेर त अब 100  बीगहा मे  पौदीना के जगहा कुचिले उगावे के परयास मे अनथक लागल बाड़ें । जेकर मुखिया आलू के करख़ाना लगा सकेला , फेर बताईं  उ कुचिला काहे नाही उगा सकत । भरम मे मति आईं सभे, इहवाँ नीमन काम , नीमन मनई , नीमन सोच के मुड़ी पर सजावे के रेवाज़ बिला गइल बाटे । रहल होई कबों –  कवनों जुग मे ,बाकि एह जुग मे त नइखे । एगो संतोष के बात जरूर लउकत बा कि कुछ लोग एह बात से खुस हो रहल बा कि फलाने के ओरवानी मे दुगो चुवना हो गइल ,एहमे अपने उधिआइल मड़ई के दरद भूला गइल बा । दोसरा के चुवना निहार के खुस होखे वालन के बुद्धि पर बलिहारी जाये के मन करता बाकि आपन बुद्धि उनका एह खुसफहमी पर तरस खाता ।

बगेदना इहे कुल्हि बतिया सोचत आ अकेलही बरबरात पाड़ें बाबा के पान के दुकानी पर चहुंप के अचके ठठा के हँसे लागल । एतना  ज़ोर से हँसलस कि अगल – बगल ठाढ़ लोगन के पूछही के परि गइल कि “का बात ह बगेदन ?”, कवना बाति के सोच के हेतना ज़ोर से हँस रहल बाड़ा ?  फेर बगेदन भगेलू चच्चा के कहलका बतावे लगने – “ एह घरी बजार मे एगो अइसन फोटो आइल ह , जवना के देखवले के बाद लोगन के बोल के माफी मांगे के जरूरत खतम हो गइल बा” । ई सुनते उहवाँ सभे लोग ठठा के हँसे लागल ।

जब हँसी रुकल त पांडे बाबा पान लगावत – लगावत बाति लोक लीहले । सुना लोगिन “सुरूज़ के ओरी मुँह कइके जे थूकेला , उ थूकवा ओकरही मुंहे पर गिरेला” । हेतना सोझ बात नाही बुझात बा , फेर त फोटो देखइबे करी लोग । जब लइका सुघ्घर आ तेज होखेला भा एकदम्मे बकलोल , दूनों हाल मे  , त लोग बाग कहेलन कि पता लगावे के चाही कि “जब ई लइका जब  गरभ मे रहे त एकर महतारी ,का – का खइले रहे” । एक जमाना रहे कि एगो पलिवार के लोग कुरसी के गरांटी होत रहले  अपने पाटी खाति , गरांटी त अबहियों बा , बाकि दोसरा के पाटी खाति । अइसनके देख सुन के पुरनिया कह गइल बाड़ें कि “ पूत जनमलें लोलक लइया, बोवें धान पछोरे पइया ” । पाड़ें बाबा के एक बेर फेर से सुनके सभे केहू जमके ठहाका लगावे लगल ।

हमनी के देश मे कबों – कबों एगो आउर बेमारी उपरियाए लागेले । अरे उहे बेमरिया जवने के तीसरकी बेमारी क़हल जाला । जब ई बेमारी भा एकर बाति सुनाये लागे , त बूझ लेंही कि चुनाव नगिचा आ रहल बा । तीसरकी बेमारी के बात एह बेरी होत त बा , बाकि तनिक अलग हट के । हर बेरी के तरे उहे छतरी राखे के कवायद से इतर बात हो रहल बा । एदी पारी छतरी के रंग बदले के सुनगुन आ रहल बा । सत्ता लोलुपता आउर आपन बाउर करम ढाँके तोपे के खटकरम के चलते अगिली पछिली कूल्ही बातन से किनारा करत त देखात बा लोग , बाकि क दिन बदे अबही कहल ना जा सकत बा । ई वाला गोबाड़ा पहिलहूँ फुलावल गइल रहल , हाला मचल , कुरसी मिलल , बाकि सबके ना । अब जेकरा ना मिलल ,उहे लोग गोबाड़ा मे छेद क के फोड़ दीहने । फेर से लोग चकती लगावता , हावा भरता , गोबाड़ा फुलावता आ अपने अपने खलित्ता  मे सुम्मी लीहले बा । कS दिन तलक ई गोबाड़ा फुलल रही , हमरा नइखे पता , रउरो के ना मालूम होखी। फेर रउवो देखीं , हम त देखिये रहल बानी ।

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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