बाकि राउर मरजी —-?

का जमाना आ गयो भाया , जेने देखा ओनही ठेकेदारी आ ठेकेदारन बयार बह रहल बा । उहो लूआर अस , ओहमे फँसते केहुवो  झोकराइए जाई । कबों पुरूबी लूआर त कबों पछिमी । ओही मे कबों कबों उतरहिया आ दखिनहियों झुरके लगतिया । बाचल मुसकिल बा । एक त अबही दिल्ली के खराब हावा आफत मचवाले रहल हे , ओही मे जाड़े मे लुआर बहे लागल । बुझाता प्रकृतियो बउराय गइल बा , कबों कुछों त कबों कुछों । अजब हाल बा भाई । प्रवक्ता त बरसाती बेंग लेखा उपराजल बाड़न स आ कुछो बड़बड़ात बाड़न स । जेतने नेता ओतने परेता । लपेटी सभे , गलत होखे भा सही , नीमन होखे भा बाउर , करिया होखे भा उज्जर । केतना जानी के सोर खोदा जाई , जवन जवन पता ना होखी ओहू के पाता चलिये जाई । लाइन लागल बा , पाँक पत्थर फेंके ला , फेर बूझी छींटा केकरा पर जाई ।

एक्के गाँव मे हेतना परधान ? सभले बेसी ऊ हंकड़त बा जवना के गाँव मे घर न सिवान मे खेती ? बाह रे पंचइती । अपना से किछो सकही के नइखे , आ दोसरा पर अंगूरी ? अरे भाई खुदही कुछ नीमन करा , आ नीमन करे वालन के आगे बढ़ावा । खरबका अपनही तोपा जाई । बाकि एह काम के करे बदे जिगरा चाही , उ कहवाँ से आई ? जहवाँ बाउर लोगिन के राबिनहुड के छबि गढल जात होखे , उहवाँ नीमन के केहू पूछी ? एगो कारड चल देही, फेर देखी भेड़िया धसान लोग ठाढ़ हो जाई रउवा ला । फेर कमरी ओढ़ के घीव पीयत रहीं , केहू पूछबो न करी । इहे इहवाँ चलल आवत बा , आ आगहू चलते रही ।

आज त इहे बुझात बा कि एगो भीड़े कबर खोदे मे लाग गइल बा । अरे महाराज , जवन कबर मे बा रहे दीं , नीमन करे ला लोग जुटाईं , नीमन करीं । केहुवों के गड़ल खोदाई त नीमन आ बाउर दूनों उपराई । मति फइलाईं बिछलहर ना त ढेर लोग बीछिला जइहें , का पाता रउवों शिकार बनि जाईं । अब त इहो बुझाये लागल कि आज समाज के बाल्मीकि के जरूरत नइखे , उनके ला इहवाँ जगहों नइखे । सुनले रही कि “जब जागे तबे ले सबेरा” , अब त लोग जगलो के सुतावे मे लागल बा । सुधारे चलल बानी ,त  जे सुधरल बा ओकरा के जगह देही । तबे नु राउर मेहनत सार्थक होई । बाकि इहाँ “खेलब न खेले देब, खेलवो बिगारब” । ई त रगरा कहाई नु , नीमन त न कहाई । इहवाँ हमरा के सदानंद शाही जी के कविता मन पर गइल , सुनी सभे –

कबूतर भी उनका
संदेश भी उनका
बांचेंगे वही
सुनायेंगे वही
बतायेंगे वही
समझायेंगे वही
बुझायेंगे वही
उडायेंगे वही
सजायेंगे वही
नचायेंगे वही  ।

 

“कउवा कान ले के भागल” सुनते कउवा के पाछा हेतना लोग लाग गइल । काम धंधा छोड़ के सभे धउरे मे लागल बा । कबले धउरी ? अरे भाई आपन कान त देख ला ? अइसनों सवख के नीमन त ना कहाई , बाकि राउर मरजी ।

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

 

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