बबुआ ला पिचकारी

रंग-बिरंग अबीर-गुलाल के दुकान लाईन से सजल रहे। लोग आपन लाईकन ला पिचकारी रंग के खरीदारी करत रहे। उहे बजार में एगो दस साल के छोट लाईका पीठ पर कबाड़ के बोरी टांगले दुकान सन के सामने से कई बार गुज़र चुकल रहे। कबाड़ बीनल त ओकर एगो बहाना रहे ऊ त मासूम आपन ललचाई नजर से पिचकारी और रंग-अबीर-गुलाल के देखत आवत जात रहे। मुंशी काका भी आपन दुकान पर बईठ के ई लाईका के देखात रले।

अंत मे मुंशी काका से रहल ना गईल त ऊ पूछ बाईठले- “ए छोटू बार बार आवत बारीस, एने त कबाड़ भी कुछ नईखे के बिन बे, का बात बा कुछु चाहि का।”

छोटू- “ना, काका हम पिचकारी देखात बानी आपन बबुआ खातिर, देखात बानी कइसन ले जाई ओकरा ला।”

मुंशी काका- “ठीक बा, ई दुकान हमरे हवे पसंद का ले, कवन चाहि।”

छोटू ई सुनके चुप हो गईल। फिर मुंशी काका कहलें- “का भाईल देख लें, कवन पसंद बा”

छोटू- “लेकिन काका काल्ह किन के ले जाएम, अभी जात बानी हाई कबाड़ बेच के पईसा लेके आएम तब ले जाएम, हाई पिचकारी के केतना रुपया दाम बा।”

मुंशी काका- “ऊ बीस रुपया के बा, अउर हाई वाला पंद्रह रुपया के बा”

छोटू ई सुन के आपन हाथ के उंगली पर लागल हिसाब जोड़ के मुंशी काका से कहे- ” इतना मे कबाड़ बेचा जाई त बबुआ खातिर पिचकारी अउर रंग आ मिठाई सब हो जाई, थोड़ा सा आउर कबाड़ बिने के पड़ी, काका हम ऊ सामने वाला भंगार से थोड़ा सा आउर कबाड़ बीन के बेच के आवत बानी तब हाई पन्द्रह वाला पिचकारी दे देम।”

ई दस साल के लाईका के एतना जिम्मेदारी अउर समझदारी देख के मुंशी काका के आंख से ऑंसू निकल गईल, भाउक हो गईले,अउर बोलले- “सुन बबुओ, तोरा नियन बेटा ऊपर वाला सबके देत, हाई ले दुगो पिचकारी एगो तोरा खातिर एगो तोरा बबुआ खातिर अउर हई ले पाँच पुरीया रंग के। अउर हाई ले एक किलो मिठाई काल्ह खातिर।”

छोटू- “काका एके गो पिचकारी दी खाली बबुआ खातिर। हम त सियान बानी हम का करेम।”

मुंशी काका के ई बात सीना के छेद का देलास, मुंशी काका प्यार से हाथ छोटू के सिर पर घुमात बोलले- “बेटा ई जिम्मेदारी तोरा के ईहे उम्र में बड़ा क देले बा ना त अभी त ते बहुत छोट बारीस, हाई सब समान हाई पालीथीन मे रख ले।”

छोटू कवनो गैर आदमी से आज एतना दुलार पाके बहुत ख़ुश रहे, तेजी के साथ आज घरे जात रहे जइसे ओकर होली आजे हवे।

  • जियाउल हक

जैतपुर सारण बिहार

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