बकैती

हाल बकैती चाल बकैती

कतना मालामाल बकैती

गुरबतिया के थाती रौंदत

नापे छ्प्पन फाल बकैती ।

 

चौहद्दी मे चुगुली पोवत

घरवें गले न दाल बकैती

आन के सतुवा आन के घी

चले शकुनिया चाल बकैती ।

 

चोरी कर सीनाजोरी से

रोज बने भौकाल बकैती

चमचे चमचे चानी बाजल

चौचक चल चौताल बकैती ।

 

दाल – भात बीच मूसरचंद

बनले बा खुसहाल बकैती

अजुवो ले अनाज के दुसमन

आन के खा निहाल बकैती ।

 

एने – ओने चोरी – लुक्का

भरले बाटे , माल बकैती

भोरे – भोरे गरकटवन अस

ढकले बाटे खाल बकैती ।

 

का सावन, का फागुन जाने

अपने बा टकसाल बकैती

चापत छापत चढ़ल बुढ़ौती

अतना उ बेमिसाल बकैती ॥

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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