बउझकवन के चउपाल

का जमाना आ गयो भाया, छाती के जगहा मुड़ी पर लोग मूंग दरे लागल । कुछ लोग पेंड़ा छील के खाये के फिराक मे जुटल बाड़ें त कुछ लोग बतरस आ बतकुचन के पगहा बरत बाड़ें । ओह पगहवा के का करिहें , एकर उनकरो के पता नइखे । मालिक के हुकुम बजावे खाति बस दिन रात जुटल बाड़ें । कनई के मइल लुगरी से पोछत बेरा ओकरे से आपन मुँहवों पोछ लेत बाड़ें । सगरों गज़ब के हाल चलत बा , सभे मगन होके लगल बा । बउझकवा के चउपलियो एह घरी गुलजार भइल बा । गोल बना बना के गलचउर चल रहल बा । साँच के तोप के झूठ के झउवा रखा गइल बा । ओही के जलपान सभे के करावल जा रहल बा । अनासे त कउववा सफेदी लगा के फिरी ना , कुछ त चक्कर हइए बा । चक्कर के घनचक्कर मे ढेर लोग अझुराइल बाड़ें । अझुराइल त उहो बा जेकरे बाति के ओर छोर पता नइखे । काहें बदे , केकरे बदे ई कूल्हि चल रहल बा, के एकरा के चलवा रहल बा , एहू पर कबों न कबों फेर से विमर्ष  होखी । विमर्ष त होखहूँ के चाही काहें से कि लयनू बिना दही के मथले ना निकरे । लयनू के चक्कर मे फटही दहियों महा रहल बा , ओकरो भाग जागि गयल बा ।

एक ओरी कुछ लोग मुँह बना बना के सेल्फिया रहल बाड़ें आ दोसरे ओरी चार जने अलगे राग अलाप रहल बाड़ें । चउपलियो के एह घरी भाग उफान मारत बा । आजु के पहिले तक उहे लोग गठरी काँखि मे चाँप के उंच नीच करे मे जरिको हिचकचातो न रहल आ आज इहवाँ घिघियात बाड़ें । नियम कानून, अनुशासन कूल्हि गंवखा मे दुबका के आइल बाड़ें । इहवाँ एगो गैंग बाटे जवन कबों कबों अइसन कूल्हि उल्टी करे खाति उपरिया जाला । बुझाता इहों लोग ओही गैंग के भाग बन गइल बा । पनछुछुर दाल जे देखवलस ओकरे हाल के खियाल एहनी के काहे ना आइल ? बुझाता कि तुलसी बाबा के बाति मे आजो ले दम बा –

 

“समरथ को नहीं दोष गोसाईं”

 

जे “काम के न काज के , दुसमन अनाज के” बा ,उहो गोड़ तोड़ के चउपलिया पर बइठकी करे मे लागल बा । जेकरा से आज ले कवनों एकहु गो नीमन काम ना भइल , उहो इहवाँ बड़का उपदेशक बनि के डोल रहल बा । अपनही मे जुत्तम पैजार करे वाला अलग अलग गोल बना के एक दोसरा पर कनई बीगे मे जुटल बाड़ें । ई कूल्हि देखि के त इहे लागत बा “सै गो मूस खाई के बिलरिया हज करे जातिया” । अब भला होखे भगतन के जे दूनों के जय जय करे मे अझुराइल बाड़ें । उ दूनों कूल्हि काम काज तज के एक दोसरा के बिंग बोले मे लागल बाड़ें । गाँव के ढोलक आ शहर के तबला मे कवन नीक कवन नीक के अजमाइस कS रहल बाडें ।

चउपाल के चारो ओरी ढेर देखनिहारो जुटल बाड़ें आ अपनही मे खुसुर फुसुर क रहल बाड़ें । कुछ त खाली मुँह बन्हले ठाढ़ बाड़ें । ई कूल्हि देखि सुन के के त इहे लागत बा कि लोग आज काल्ह सोचल समझल छोड़ देले बा । नीक बाउर के फेरा से बहरिया गइल बा भा बहरियाए के नौटंकी क रहल बा । कुछ अइसनो हो सकेलन जे मने मन गुरमुसात होखिहें । बाकि कहे भा करे से अपना के अलगा रखले बाड़ें । हो सकेला उ कूल्हि मानसिक दलित होखे, जेकरा सोझा आ के कहे मे मुँह थुरा जाये के डर होखे । ई कूल्हि समाज के जोंक बाड़न सन । एहनी के दिन बभनन के गारी देवे से शुरू होखेला , दुपहरिया होत होत क्षत्रियन के गरियावे लागेलन स , सांझी तक खुदही दलित बन जालें । सुने मे आवेला कि ई एगो अइसन मानसिक बेमारी हे जवने मे मनई इहे सोचे मे बीता देवेला कि उ केकर जामल ह ।

ओही चौपलवा पर कुछ नवहा जोड़ा लाज हया बिलवा के प्रेमालाप मे लागल बाड़ें । उनके देश दुनिया से कवनो मतलब नइखे । केहू कुछहू कहे भा सोचे, ओह लोगन के कवनो फरक ना पड़े । भीड़ मे खाड़ कुछ त अइसनो बाड़े सन जवन एक बेर केकरो से कुछो ले लेलन स , त लउटावे के नाँव ना लेवेलन स । बउरहवा के चउपाल साँचो समाज मे एगो अलगे जगहा बनवले बाटे जवन निठल्लन के मउज आ बेकारन के बेमतलबे मे एगो काम थमा देले बा । सभे केहू सब कुछ भुला के ओही मे अझुराइल रहत बा । बढ़िया ह , कम से कम लोग बेरोजगारी के लेके नटई फारल कुछ दिन खाति भुलाइल रही आ “सरकार मस्त जनता त्रस्त” ।

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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