पड़लन राम कुकुर के पाले

“ए साह जी हो, तनी एगो कड़क चाय पियवता भाय।आज दिमाग बड़ा गरम ह।”हाँफत-हुँफत हलकान हाल नन्हकू अड़ी पर अवते साह जी से फरमाइस कइलन।
” काहें मूड ख़राब ह नन्हकू भइया।बतावा भला साह जी! जे काम के न काज के,दिन भर लखेरा नियन घुम्मत रहेला ओहू क मूड कब्बो खराब हो सकेला ?।” एक जाना नन्हकू के दिमाग क  तापमान बढ़ावत हंसी कइलन।
” ए साह जी!कह देत हईं कवनो दिने तोहरे दोकान पर खून-खराबा हो जायी त हमके दोस मत दीहा।ई ससुर जवने के सोझ डहरी ना चले आवत उहो उपदेस देवे सुरु कय देत ह।जवने दिने हमार माथा फिरल तवने दिने मूड़ी प खच्च से गंडासा चलल।जे हमसे लगी जान से जायी।” नन्हकू क्रोध में बोलत जात रहलन अउर जे उनके कुछ देर पहिले लखेरा कहके चिढ़वले रहे ओकर आकी -बाकी पूरा करत चुन -चुन के गारी देत जात रहलन।
” जाये दा भाई तू लोग काहें बात क बाती पूरत हउवा लोग।साह जी के अड़ी प मोसल्लम आग क इंतजाम ह।जनते हउवा लोग केतना जरतुहा लोग बइठल हउवन इँहा।केहू झगरा सझुराई ना इँहा सब आगे लगायी।” एक जाना बीच-बचाव करत नन्हकू के समझावे -बुझावे लगलन बाकिर नन्हकू क चित्त सांत ना होत रहल।
” का भयल ह भाय नन्हकू। कुछ बतइबो करबा कि बस मूड़ी गोतले मातम मनइबा ..आंय।” साह जी चाय छानत, नन्हकू के भरुका थमावत पुछलन।
“का बतायीं साह जी ,कहतो क संकोच लगत ह।” नन्हकू दुख साझा कईल चाहत रहलन बाकिर ऊ दोगुना होत जात रहल।
“अरे भाय,भोले -भंडारी के नगरी में के के दुख ब्यापत ह हो भईलोगन।तनी सुनी त।” फजीहत गुरु सुर्ती ठोंकत हँसत-ठठात नन्हकू के लग्गे आके बइठ गयिलन।
” देखा गुरु कब ले नन्हकू भइया सस्पेंस बनवले हउवन।कब ले सब पूछत ह कि काहें रोवां गिरवले हउवा त बतवते ना हउवन।हम त अबहीं मुंह से कुछ कढ़वते हईं कि किटकिटात,खिसियात, गाल फुलवले कटहा बानर नियन बकोटे धउड़े लगत हउवन।” जवन जाना नन्हकू के लखेरा कह के पहिलहीं गारी-फक्कड़ सुन ले ले रहलन, उनकर फजीहत गुरु के अवते पलरा भारी हो गयल रहल।  ऊ बेहिचक नन्हकू के कटहा बानर कह के मजाक उड़ावत ,हंसी-ठट्ठा करे में मगन हो गयल रहलन।
” देखा गुरु तोहरे लिहाज में हम एह अदिमी के कुछ बोलत ना हईं , नाही त इनकर एक्के छन में गती-मुक्ती बनाय देतीं।”नन्हकू दांत पीस-पीस के फजीहत गुरु के सुरक्षा घेरा से छिटक के अपने दुस्मन क घेंघा चाँपे के फिराक में फड़कत रहलन।
” अरे जाए दा ओनके भाय नन्हकू ! हमसे बतावा का भयल ह, का दिक्कत -परेसानी ह ?”  फजीहत गुरु नन्हकू क चिंता -फिकिर साझा करे क कोशिश करे लगल रहलन।
” का बतायीं भइया एगो पटीदारी क बाबा हउवन। ऊ नब्बे बरीस के पार होइहन।कई बरीस ले हारी-बेमारी प कासी ले आवल जात हउवन कि कहीं मर-वर जायं त उनकर गति -मुक्ति बन जाय बाकिर बुढ़ऊ मूवते ना हउवन।सब सेवा-टहल,दर-दवाई करत- करत थाक गयल।बिछवने प कुल्ह करम होत ह बाकिर  मरे क नाम ना लेत हउवन।” नन्हकू बोलत-बोलत हफरी छोड़े लगल रहलन।
” तोहार आपन बाबा ना न हउवन, दर-दयाद न हउवन त तोहके कवन फिकिर।अब जनमो-मरन केहू के हाथ में ह? सब त भोले-भंडारी, औघड़दानी के हाथ में ह।जब ऊ खोजी कय दें… जाए दा यार, काहें बुढ़ऊ क दुर्गत करत हउवा जा।” फजीहत गुरु अबहीं बतिया खतमें ना कइलन कि नन्हकू फफाये लगलन।
” ए भइया ऊ खुदे सबकर दुर्गत कइले हउवन, दोसर का उनकर दुर्गत करी।हमहन क भले दयाद -पटीदार होखें बाकिर मान-जान अपनही बाबा नियन कईल जाला।जब -जब बेमार होलन इहे अदिमी दउर-धूप के दवा-बीरो करावे ला।उनकर बेटी दमाद त एहि बनरसे में रहे लं बाकिर बुढ़वा के कुकरम से त्रस्त कब्बे तियाग देले हउवन।इहे अदिमी गाँवे-घरे क होवले के नाते लाज ढोवत ह।” नन्हकू क खुनुस बढ़ले जात रहल।
” कवन कुकर्म कइले हउवन भाय कि बेटी-दमाद झांके ना आवत हउवन ?”फजीहत गुरु क जिज्ञासा चरम प रहे।
“ऊ कुल छोड़ा भइया लंबी कहानी ह।अब चलत हईं बुढ़ऊ बदे मोसम्मी क जूस ले जाए के ह।”
“बतावा भला हेतना हुंसइले प अबहीं मोसम्मी क जूस फयदो करी …आंय।” एक जाना फिर लुत्ती लगवलन।
” चुप करा भाई काहें नन्हकू के पीछे पड़ल हउवा।ए नन्हकू मन थोर मत करा यार।काशी में मुक्ति सबके ना मिलेला ,बड़भागी लोगन के इँहा गति-मुक्ति मिलेला।एहि बात प एगो खिस्सा सुना जा।बहुत पहिले क बात ह।रामेश्वरम में एगो ब्यापारी धनंजय रहत रहल।खूब पुण्यात्मा,दानी-धर्मी रहे।ओकर यश-कीर्ति दूर-दूर तक फैलल रहे।जेतने ऊ प्रसिद्ध रहे ओतने ओकर माई बदनाम,चरित्रहीन।माई के पथभ्रष्ट भइले के बाद भी धनंजय क ख्याति कम ना भईल।एक दिन ओकर माई मर गईल त ओकरे आत्मा के शांति खातिर एक सुन्दर तांबा क बक्सा में ओकर अस्थि रख के ऊ गंगा जी में प्रवाहित करे बदे काशी आईल।मजूरा जवन बक्सवा उठवले चलत रहे ऊ लालच में पड़ गयल कि जरूर ए बक्सा में कुछ कीमती चीज होई जवने से ए ब्यापारी क ऐसे एतना लगाव ह।जइसहीं ब्यपरिया कुल्ला-दतुवन करे गईल कि मजुरवा बक्सवा ले के भाग गयल।कुछ दूर गइले प जब ओके खोललस त देखत का बा कि ओम्मे हाड़े-हाड़ भरल ह। मारे खीस के मजुरवा हड्डियन के एहर-ओहर फेंक देहलस।त ए बचवा नन्हकू हो, देखा ऊ पथभ्र्ष्ट, कुकर्मी मेहरारू के मुअलहुँ प एह काशी जी में मुक्ति ना लिखल रहे।त ई जवन बुढ़ऊ कपारे आके पड़ी गयल हउवन त का करबा खींच-खांच के पार लगावा जा।बाकिर जान ला ए बचवा सबकर एक दिन इहे आवेला,खाले जाए वाला। काहें से कि सबही न राम जी क कुक्कुर ह…. कहा कि झूठ कहत हईं।” सुर्ती ठोंकत, ठहाका लगावत फजीहत गुरु अड़ी से उठ के चल दिहलन अउर नन्हकू के मन में उनकर आखिरी वाक्य ‘सबही न राम जी क कुक्कुर ह ‘ कांट नियन करकत धंसल चल जात रहल।

  • सुमन सिंह

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