परिभाषा माने जवन हम गढ़ी………!

का जमाना आ गयो भाया, अब मनई लोग के बजार लाग रहल बा। दोकान सजा – सजा के लोग बइठल बा, खरीदे वालन के इंतजार हो रहल बा। जेकरा नइखे बेचे के, ओकर मालिक लोग पहाड़े हाँक देले बा अपने मवेसियन के। राशि एकही बा मवेसी आ मनई के। अपने हिसाब से बूझ लीहल जाव। हम बड़का, हम बड़का के हो – हल्ला चारु ओरी मचल बा। केकरो चैन नइखे, जे चैन मे बा, ओकरो चैन मलिकार लो छीने मे लाग गइल बा। कुछ के त छीनियो लेले बा। जेकरा के काल्हु तक बाउर – बाउर कहि के नरेटी फ़ारत रहल ह लो, आज ओकरही चउकठ पर मुड़ी पटकत बेर जरिको लजातो नइखे। लाज-शरम के घोर के पी गइल बा लो। सभे मिली के “नैतिकता” नाँव के कवनो चीज हेरत बा। ओकर पहिचान आ परिभाषा अपने-अपने हिसाब से बता-बता के हेर रहल बा। अपने सुतार के हिसाब से परिभाषा, हमरे सही परिभाषा बा, एकर दंभ। उनुका रहता मे जे आ रहल बा, सभे बाउर। समने वाला मनई अझुराइल बा, केकरा के नीमन कहो आ केकरा के बाउर। कुछ लो मोट मोट पोथी पलटे मे लागल बा, त कुछ लो बतकुचन मे। सभे एक दोसरा मे खराबी हेरे मे जीव-जाँगर से जुटल बा।

 

बतिया एतने तक ले रहत त ठीको लगत, इहवाँ त लो एक दोसरा के हतियार बतावे के फेरा मे लागल बा, आ अपना के बड़का साधु। एक के सुनब त दोसरका चोर आ हतियार बुझाई आ दोसरका के सुनब त पहिलका। एहमे केकरो मगज के दही जाम जाई। जवना काम के आज लो सही बता रहल होई ओकरे के कुछ देरी मे गलत बता देही। एने-ओने घुसुर-घुसुर के एक दोसरा के चुगुली काटल फ़ैसन बाटे। काल्हु जवने काम के एक जना सही बता के कइले होखी, आज जब उहे काम दोसरका क रहल होखी, त ओकरा के बाउर बतावे मे देर न लगाई। इहवाँ जेकरा के मोका लाग जाई उहे बेगर नियम वाला खेला खेले मे लाग जाई। के केकरा के का बोलले बा, एकर कवनो महातिम नइखे। एक दिन पहिले जेकरा के अछूत बोलत रहल होखी अगिले दिन ओकरे के मलिकार बना के ओकर चाकरी करे मे जुटल देखाई देही।

आजु के देश आ समाज मे कवनो अइसन क्षेत्र नइखे बाचल, जवने के साफ सुथरा कहल जा सके। राजनीति होखों भा आउर कवनो क्षेत्र, हर जगहा अइसन बात देखे मे मिल जाई। राजनीति मे ई खेला देश के स्वतन्त्रता के बेरा से चल रहल बा। ओही के देखा-देखी आउर दोसरों क्षेत्र मे ओकर असर देखाए लागल बा। शासन परशासन से लेके भाषा तक, नोकरी से लेके सलीमा तक, साहित्य से लेके संस्कृति तक, जात से लेके धरम तक सगरो लँगड़ी मारे के खेला चल रहल बा। मोका लगले के देरी बा, लँगड़ी मारे मे लोग तनिको देरी ना लगावे। अपने मगज के सभे अरस्तू के मगज बूझेला आ दोसरा के वेस्ट मैनेजमेंट के प्लांट। मय खनदान संगही लाग जाई लो लँगड़ी मारे मे, सफल ना होखी त थूथून लटका ली लोग। जवने देश मे जाति के, धरम के पंचाइत होत होखे, उहवाँ समरसता आ नैतिकता के बात के का मतलब बा।

गांथल-गूंथल एक पाव तउलल पिसान मे भोज बना के भर गाँव के नेवतल उहो कुचकुचवन के, जवन कवनो खोंढ़र देखते लार टपकावत होखे सन, परिभाषा खराबे नू करिहें। अइसन मे त अपनही नून रोटी के संगे गुजर बसर कइल आ नीमन समय के जोहल आ समय के देखत हिसाब बनावल सही रहेला। एही से रहीम बाबा कहि गइल बाड़ें –

रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर॥

आजु के जमाना मे कब कीरा आ नेऊर, तोता-मैना बनि के डोले लगिहें, कहल मोसकिल बा। मने एक-एक मनई कई-कई गो मुखौटा रखले बा। कब कवन पहिर लेही, ओकरो नइखे पता। के केकर चिन्हार बा आ के अनचिन्हार बा, बूझल सरल नइखे। दोसरा के हलुक बूझल अपना करिहांय मे लचके कबारल नू कहल जाला। हाली-हाली के फेरा मे उहे भइल, जवने के डर रहल। परि गइल लचका, अब बइठ के करत रहीं करुवा तेल से मालिस आ घामे सेकत रहीं, जबले लचका दूर न हो जाउ।

बधुवा मजूर राखे भा बनावे वाली बतिया ओराइल नइखे, अबहियों बा, बुझाता अगहूँ रही। लोग बा कि मजूरा बनि के खुस हो रहल बा, खुस होत रही। काहें कि जवने के हमनी भा कानून आतंकवादी कहेला, ओकरा के कुछ लो जेहादी कहेला। इहे हाल साहित्यों मे लउकत बा, जेकरे बस मे कुछो करल नइखे, उ दोसरा के कइलका के प्राक्सी कहेला। आखिर का करब, ओकरो आपन दोकान चलावे के नु बा। बरिस मे एक बेर पिकनिक मनावे के नु बा। कुकुर के घीव हजम ना होखेला, उ खा लीही त ओकइबे करी। अपने गिरोह के मजूरन के धमकइबे करी। आखिर दोकनिया चलावे के बा नू। आखिर ओकरे खलिहर दोकान मे जब कवनो सउदा नइखे बाचल, त लो दोसरे दोकान नु देखेला। अब केकरो पेटबथ्थी धरत होखे त धरो। हम त इहे कह सकीले कि ए बबुआ ! हींग पानी के संगे घोंटा, अराम मिली, आ बइठ के गढ़त रहा परिभाषा, जीव हलुक बनल रही ।

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

Related posts

Leave a Comment