टोंटी आउर धोबियापाट के जतरा

का जमाना आ गयो भाया, सभे भाई लोग कुछ ना कुछ उखाड़े-पछाड़े मे लाग गइल बाटे। अखाड़े के रसूख खाति “धोबियापाट” कबों ना कबों लगवहीं के पड़ेला। जब सभे दाँव फेल हो जाले सन, त “धोबियापाट” के सहारा बचेला। फेर मौका आ दस्तूर देखि के “धोबियापाट” दे मारेलन पहलवान लोग। अखाड़ा मे लड़े से पहिले पहलवान लोगन के दिमाग मे एकर जोजना बनि जाले। आखिर अखाड़ा के इज्जत के सवाल उठि जाला। आ इजत खाति त इहवाँ मडर हो जाला। एह घरी सभे एक मुस्त एक्के जोजना पर काम क रहल बाटे। ढेर दिन के मसक्कत के बाद एगो जोजना हाथ आइल बिया, भला कइसे ओकरा छोड़ के कवनो दोसर काम कइल जा सकेला। इहे एगो अइसन जोजना बुझा रहल बा जवने से कुछ भेंटाए के उमेद बा। तन मन धन से ओह जोजना के फलीभूत करे मे पूरा पलिवार जुट गइल बा, त कुछ लोगन के पेटबथ्थी ऊपर आइल बा। जब पेटबथ्थी उपरिया जाले त लोग नरिआए लागेला। कुछ लोग चिचरी पारे मे लाग जाला, एह घरी इहे चल रहल बा।

जवने देश मे आलू डलले पर सोना निकलत होखे, ओह देश मे समाजवाद डलले पर टोंटी से सत्ता निकले के उमेद होखे, त भला केहू ओकरा के कइसे छोड़ देही। ओही टोंटी से जब पिसास बुझे के भरोषा होखे, लमहर मेहनत क के जुटावल होखे, त कतनों नरेटी फ़ारत रहे लोग, छोड़ले ना जा सकेला। एही बीच ओकरे सुरक्षा के बात उठ रहल बा, त कस के पकड़ल जरूरी बा। अरे भाई! जवने देश मे राति के 2 बजे कोरट  खुलि सकेले, फुटपाथ सरक के चल के गाड़ी के नीचे आ सकेला, हरिना अपने से गोली मार सकेला, त बिछोह मे बँगला काहे ना उजाड़ हो सकत? समाजवाद के संगे हेतना गरमी मे जब सोझे घामे खोपड़ई मे आगि धधके लागत होखे, ओह घरी बेघर होखे के पड़ी, त बुझइबे न करी। उहो राजप्रसाद छोड़ल त मनई के उखाड़ी देही। फेर अइसना मे केहू अकबक बोले लागे, भा मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाय, त अचरज नइखे।फेर केकरो से कप पलेट उठवाईं भा पोंछा लगवाईं, राउर मरजी।

बेचारी टोंटी! जेकरा के देखी सभे कोसे मे जुटल बा। अरे भाई! जब चारा, कोइला, टू जी, थ्री जी सम्मानित होत रहल, तब काहे ना लोग नरेटी फारल। फारे के चाहत रहल न। अब जब टोंटी के राजकीय सम्मान मिल रहल बा, त तकलीफ काहें? लोग बाग दोसरा के सम्मानों ना देखल चाहत बाड़े। अब भलही बुआ के पाँव पूजे के पड़ो, चाहे कन्हैया उठावे के पड़ो, टोंटी के सत्ता के जरी लगावल जरूरी बा। एह घरी त कवनो तरे सुखत समाजवाद के बचावल जरूरी बा। जवने अल्पसंख्यक के बल पर आजू से सांस लेत रहल ह, अब खुदही अल्पसंख्यक बन गइल बा। सुने मे त इहों आवत बा कि सरकार एकरो के संरक्षित के श्रेणी मे डाले जा रहल बा। फेर त अगिला पीढ़ी के लइका लोग पढ़ी – “एक था समाजवाद”। अब इहो बतावे के पड़ी कि समाजवाद स्वहितवाद मे बदल चुकल बा। आँखि खोल के देखा, कुल्हि बुझा जाई। अब अइसन कइसे होखे दियाई, एकरा के बचावे खाति त कुछहु उखाड़े के पड़े, उखाड़ दियाई, टोंटी के कवन बिसात बा।

जोड़ घटाव के फेरा मे ढेर लोग अझुराइल बा। अबहिए ले पहिले हम-पहिले हम वाला खेला चालू हो गइल बा। नेउर-कीरा के दोसती होखे भा बइर आ केरा के संगति, एकर हाल पहिलही से सभे के मालूम होला। चार दिन के अंजोरिया हवे,फेर त अन्हरिया राति के बेरा शुरू हो जाई। पब्लिक आपन चैनल बदल-बदल के तमाशा देखे मे अझुराइल बा।अब कंटरोल वाली चिन्नी होखे भा सरकार रो पीट के चलत रही। अइसने बिलारी के भागे सिकहर टूटबे करेला, फिरो टूटी। कतने कुकुर सदेह सरग के जतरा करिहें,अपना के मालूम नइखे। बाकि जतरा त होखबे करी। पहिलहुं कई बेर भइल बा, आ अब्बो कई एक जगहा हो रहल बा।

दू-तीन बरीस मे भरुही बनुक से एकहू फायर ना करेम, त ओकरे नालिया मे मुरचा लागि जाई।फेर मुरचा छोड़ावे मे ढेर मेहनत करे के परी। बनुकिया त बदलल नइखे, पहिलहुं एकरा के लोग चलावत रहे, अब इ कहल कि चलते नइखे, मतलब चलावे नइखे आवत। जब हेतना दिन मे चलावे ना सीख पावल लोग, त आगु कइसे चलाई। अब कपार पीटले का होखे वाला बा। एही भरूहिया खाति गल्ली-गल्ली,चउक-चउक धूमत बेरा सोचे के चाहत रहे नु। तब इहे भरूहिया नीमन लागत रहे, फेर अब बाउर काहें बता रहल बानी। पब्लिक के सब बुझात बा, कबले दोसरा के मूरख बूझत रहब महाराज। कहीं पब्लिक रउवा के मूरख बना दीहलस तब का करब। फेर केकर दोस निकालब। फेर कइसे नैतिकता के पहाड़ा पढ़ाइब?अब त उहो रउवा लग्गे नइखे बाचल। सगरी पोल-पट्टी खुल चुकल बा। माफी के कटोरा लेके कई एक दुवारी घूम चुकल बाड़ी। बाकि इ त मनही के पड़ी कि रउवा नीमन कटोरा खोज लेले बाड़ी, ढेर लोग के एकर जरूरत पड़े वाला बा। ओ सकेला कि कबों टोंटी वाला रउवा लग्गे कटोरा खाति पधार जाव। अब ना त कुछ दिन मे जरूरत पड़ही के बा। अरे भाई! इ धोबियापाट के नई स्टाइल ह। फेर केकरो होस रही कि के कप पलेट उठवलस आ के कटोरा। बाक़िर जतरा त अगहूँ होत रही, लोग आई, लोग जाई।

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

Related posts

Leave a Comment