जिउतिया

जिउतिया    से     बड   कवनो,   माई   व्रत     ना    जानेली।
लमहर उमरिया खातिर करsस, एतना लइकन के  मानेली।।

बिना   खईले   पियले ,  रहेली   उपवास।
ओह माई के कबहू, ना टूटे के चाही आश।।

सतपुतिया के सब्जी खाली,मडुवा के  उ रोटी।
नोनी के उ साग बनावस, कईसहु जाली घोटी।।

सतपुतिया के पतई पs, खाना देली चिल्हो सियारो के ।
फेड पs राखस भा छत के ऊपर,ई करत रहेली कारो के ।।

जिउतिया के  जीवित्पुत्रिका के, नॉव से भी जानल जाला हो।
कुआर  महीना  के  अन्हरिया  में, ई परब मनावल  जाला  हो।।

दीर्घायु  लइकन के होखे ,एकरे खातिर  करेली।
सगरो दुःख दरदिया सहस,हँस के पीड़ा हरेली।।

घटना   दुर्घटना  में  ,जब   केहू  भी  बच    जाला   हो।
माई खर जिउतिया कइले रहली,होई जाला हाला हो।।

सतयुग  में  एगो  राजा रहले, उनुकर  नाँव जीमूत वाहन  रहे।
तबसे शुरू भईल जिउतिया, जेकर आजुओ लोग कथा कहे।।

धौम्य मुनि से सुन के, ए व्रत के,  द्रौपदी भी कइले रहली।
जीमूतवाहन के कुश  आकृति बना के, पूजा कइले रहली।।

चिल्हो सियार के कथा,लोग आपस में मिल के  कहेला।
बडा    सभ  धयान  से   सुने,  कनवा  सटा   के  रहेला।।

सत  पुतिया  जइसे  फईले,  वइसे  बढेला  वंस।
मानल जाला नोनी साग के, कुछ तs होला अंश।।

एक दिन राजा जीमूतवाहन,संघ पत्नी के  गइले ससुरारी।
चारो ओर हsहाकार मचल रहे, रोवत रहली सभ महतारी।।

पुछला पs लोग बतावल, आपाना विथा कहानी के ।
लइकन के एगो गरुड खाs जाला,गोदी सुना भईल केतना जानि के ।।

लईकन के बदले खुद ही ,राजा गइले  गरुड  के  पास।
गरुड जी भी अचंभित भइले,देख के  उनकर विश्वाश।।

राजा  के   बात  सुन  के ,गरूड  जी खुश  हो  गइले।
स्वर्ग लोक से अमृत लियाके, सभ का के  जियइले।।

– दीपक तिवारी
श्रीकरपुर
सिवान

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