जस करनी तस फलिहारी

जस करनी तस फलिहारी

रात अन्हरिया , बाबूजी ।

साँच कह मुँह मारल जाय

बात अनेरिया , बाबूजी ।

 

शहरी लौछार लगल जब

भिहिलाये भीत लगल तब

लाग लपट भउकन सोझे

कुच कुच करिया, बाबूजी ।

 

ऊसर डाबर सोच भइल

नेह क गठरी नोच गइल

बमकत बन के जज़बाती

बाजल थरिया, बाबूजी ।

 

अनचिन्हल सभही नाता

संस्कार संगे  बिलाता

सपनन के रोज समापन

बोझ डहरिया, बाबूजी ।

 

मन कुल्हरे, जन कंहरे

बीपत बा सगरी तहरे

क़हत सुनत बीतल जिनगी

राग खबरिया , बाबूजी ।

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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