जरिके मे काहे बदलि जाले बोली

का जमाना आ गयो भाया ,जेहर देखा जेसे सुना सभ बिखिआइए के बोल रहल बा । बोलत बेर इहो भुला जाता कि समाज मे ओकर एगो अलग पहचान बा । घर पलिवार से लेके संघतिया लोग तक बिखबोली मे लागल बा । संगही संगे सभे के बेवहार बदले लागल बा । लगता सभे के आँखि के सोझा  कवनो परदा लाग गइल बा भा दिन अछते दिनौधी हो गइल बा ।  रतौंधी वाला लोग ढेर मिल जाला बाकि दिनौंधी वाला लोग पहिले हेरे के पड़त रहने । अब त ओहनियों के फफा गइल बाड़न स । कुल्हे गली – नुक्कड़ पर गलचउर करत भेंटा जालन स । चउक – चौबारा त ओहनिन से भरल बा । बुझाता जइसे कि दिनौंधी के महामारी फइल गइल बा । डागदर बीरो ओहनी पर बेअसर  हो गइल बाड़े । दवा दारू जरिकों असर नइखे करत ।

कपारे हाथ धइले पांडे बाबा एही उधेड़बुन मे अझुराइल रहने तबले अचके मे मंगरुवा के बोल सुनाइल । काहो बाबा ! कइसन गुरमुसइले मातिन बइठल हउवा ?

कुछो त ना रे मंगरुवा , बस अनही मन थोर भइल बा । एगो बेमारी के लेके मन अझुराइल बा ।

कइसन बेमारी बाबा ? घरे मे केहू के तवियत खराब बा का ?

अरे ! शुभ शुभ बोल ! घरे मे सभे केहू ठीक से बा । हम त समाज मे फ़फाइल एगो बेमारी के लेके सोचत रहनी ह ।

कवन बेमारी हो बाबा ? हमरो के बतावा ।

तें का करबे जान के ? तोर उमिर  अबही खेले खाये के ह , मस्त रहल कर ।

ना बाबा हमरो के बताई । बेगर जनले हम मानब ना , आ राउर पाछा ना छोड़ब ।

मनबे ना त सुन  ! जवने देश मे देवी देवता से लेके रंग तक के जात धरम बंटा गइल  होखे , ओह देश अइसन कुल्हि बेमारी होत रहेनी । इहवाँ एतना वाद चलेला कि पते ना होखे कि के का बा । अइसने एगो परदा लोगन के आँखि पर एह घरी चढ़ल बा ,बोले से पहिले ओह लोग के लउकबे ना करे । दिनौंधी के चकरी मे घूमरी पारत बाड़े सन । मन मे जहर , करम मे नीचताई  आ दिमाग मे गोबर भरले कतहूँ  गंध फइलावे से बाज नइखे आवत । अपने उमिर , ओहदा के होस नइखे , गरिया के बड़ बने के सपना पलले बाड़े सन । दोसरा के हिस्सा के खाके एने ओने गोबर करत बाड़े सन । घमंडे अन्हराइल बुद्धि के भसुर दिमाग से दलित एह समाज खातिर काल बाड़े सन । नवहन के दिमाग मे जहर भरत बेरा एहनी के सकून मिलेला ।

अइसनका लोग कहीं बहरे से ना आवेला , हमनिए के बिच्चे घुसुर के रहेला आ हमनिए के गरियावेला । अपने मुंहे मिया मिट्ठू बनल ओहनी के आदत होला । पीठ पाछे केकरो बुराई करे से ना चुके । हमनिए के सहजोग से अगहूँ बढ़ल चाहेला आ मोका मिलते छुरा भोके से बाज ना आवे ।

फेर बाबा एहनी से बाचे के उपाय का बा ? हमनी सभे  कइसे बाचल जाई आ कइसे पहिचानल जाई ?

सुन बबुआ ! एहनी के एगो आदत होला ‘ई सोझे मीठ बोलवा होलें’ आ पाछे चुगुली करेलन स । जरिके मे एहनी के बोली बदल जाले । अपने मुँह मिट्ठू बनल ओहनी के आदत होला । आपन काम बनावे ला  कतों न कतों उलटी जरूर करिहें । जे अंगुरी पकड़ के चले सिखवले होई ओकरे सोरी मे मंठा जरुर डलिहें ।  बस जइसही कतों से सुने के मिल जाव , सचेत हो जाये के चाही । फेर गवे गवे अलगा हो  जाये के चाही । एकरे मे भलाई बा । समाज मे फइलल अइसन लोगन के कगरिया के आपन काम करे के जरूरत बा । अइसन लोगन के खाति आपन तागत बेकार न करे के चाही । उ तागत बाचल रही त केहरो आउर काम आई । आजु ले गाँठ बान्ह ले आ अपने नीमन काम करे मे लाग जो ।

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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