“चिठ्ठी”

“Ravi sir, there is a letter for you”
“रवि सर, तहरा खातिर चिठ्ठी बा” कहत चपरासी रवि के सेक्शन में दाखिल भईल। चिठ्ठी के नाम सुन जेतना अचरज रवि के भईल ओतने उनके सहकर्मी कुल के। आजु के जमाना में भी चिठ्ठी भेजे ला केहू। रवि के भी निमन से याद रहे कि बरसो से उनका के केहू चिठ्ठी नईखे भेजले। चपरासी के हाथ में चिठ्ठी के लम्बाई से देख के ही उ समझ गईले कि इ विदेशी चिठ्ठी ह अउरी हाथ में लेते ही ओयिपर मोट लिखावट से उनका समझे में देर ना लागल कि इ चिठ्ठी बाबू जी के लिखल रहे। बाबूजी के लिखावट पूरा जवार में परसिद रहे। मने में आशंका भईल कि काहे बाबूजी उनके चिठ्ठी लिखले बानी। जब से मोबाइल के जमाना आईल, मोबाइल पर ही बात होई जाला।
फेरु उनका करीब एक महिना पहिले बाबूजी से भईल बात इयाद आ गईल-
“तहरा माई के तबियत हमेशा ख़राब रहता औरी उनका डर समा गईल बा कि उ अब बचिहे ना। बस एक बार तहार अउरी बच्चन के मुह देख लेबे चाहतारी। मन त हमरो बहुत करता देखे के पर हम त कवनोगा से करेजा के पत्थर क लेले बानी। पर उ नईखी मानत।” बाबूजी याचना के स्वर में कहनी।
रवि झल्ला उठले “बाबूजी केतना बार कही कि अभी आवल संभव नईखे। हमहू रउवा सब से मिले चाहत बानी। पर एयिजा नौकरी के जिम्मेदारी अउरी बच्चन के पढाई के जिम्मेदारी से हम बाझल बानी। रउवा हर बार एके बात दुहरावेनी औरी हर बार हम रउवा के समझावेनी”
“बाबू, हम त सब बुझतानी अउरी बुझे के त तहार मायियो बुझतारी पर उ अपना ममता के हाथे मजबूर बाड़ी” बाबूजी कहनी “उनका अभियो तहसे कुछ उम्मेद बाकी। एगो माई बाप अपना औलाद के एही उम्मीद में पालेला पोसेला कि कम से कम ओकरा अंतिम समय में त उ साथे रहे। इ ऋण होला माई बाप के। कम से कम इहे समझ के कि इ ऋण चूकावे के बा, आजा”
बाबू जी के बात पर रवि खिसी भूत हो गईले “वाह बाबूजी का बात कहनी। मने औलाद के रौवा ममता मोह से ना बल्कि स्वार्थ से पलनी कि बुढ़ापा में उ आके राउर सेवा करी। आपन अउरी अपना बच्चा कुल के भविष्य बिगाड़ के रउवा लगे रही। हम आ त ना पायेब पर रउवा सब के ऋण जरूर चुकायेब। बताई केतना खर्च भईल पर हमरा ऊपर। हम सारा पईसा सूद सहित भेज दे तानी।”
एकरा बाद फ़ोन कट गईल अउरी तहिया से कवनो संवाद न रहे।
रवि माई बाबूजी के अकेल संतान रहले अउरी बाबूजी सरकारी नौकरी में रहनी। एगो संपन्न परिवार के जईसे ही उनकर बड़ा दुलार से लालन पालन भईल रहे। बड भईला पर इंजिनियर बनले औरी बड़ा धूमधाम से बियाह भईल। बियाह के कुछ दिन बाद माई बाबूजी के भी साथे बोला लेहले रहे खातिर। फेरु दू बच्चा के बाप भी बन गईले। आर्थिक सम्पन्नता के बाद भी घर में चैन ना रहे अउरी ओकर मुख्य कारन रहे उनका पत्नी के उनका माई बाबूजी के ना पसन कईल। आधुनिक युग के बहू के जईसे ही उनहू के सास ससुर बोझ लागे औरी एकरा के लेके रोज रोज खटपट होखे।
समस्या के भवरजाल में फसल रवि के एक दिन एकर हल मिल गईल। उनका विदेश में नौकरी के ऑफर आईल औरी उ अपना परिवार के साथे विदेश शिफ्ट क कईले। माई बाबूजी के वीसा ना मिलला के बहाने अपना देश में ही छोड़ देहले औरी ओई दिन से लेके आजू दू साल बीत गईल रहे पर उ मुड के अपना देश के मुह ना देखले।
“what are you thinking?”
“का सोच रहल बाड़?” उनके ध्यान मग्न देख के एगो सहकर्मी पूछलस औरी फेरु उ उनकर तन्द्रा टूटल। उ चिठ्ठी खोल के पढ़े लगले।
जेतना मोट अउरी स्पस्ट बाबूजी के लिखावट रहे ओतने बरियार ओकर शब्द रहे-
“चुकी अब बात ऋण चुकावे के आ गईल बा अउरी तू ऋण चुकावे चाहतार त हम कवनो तरह के औपचारिकता ना लिखत सीधे लिख रहल बानी – तहार इच्छा बाकि तू बचपन से लेके आजू तक के कईल सूद सहित वापस करब। त हम शुरुआत पहिला दिन से कर तानी।
तहरा पैदायिश के समय तहार माई के बड़का ऑपरेशन भईल रहे। उ एक हफ्ता तक कष्ट से छट पटात रहली। हम चाहेब कि एक हफ्ता ओयिसने कष्ट से तू गुजर। घरे आईला के बाद करीब दू साल तक ना हम ना तहार माई कबो भर नीन सूत पवनी जा काहे कि तू रात भर हमनी के जगा के रख। हम चाहेब कि तू दू साल जाग के बिताव हमरा सिरहानी। जेतना बार हमनी के कपडा भेवल अउरी जेतना बार हमनी के ओद बिस्तरा पर सुतनी जा, हम चाहेब कि तुहू ओतना दिन सूत ओ बिस्तर पर। जब तू 9 साल के भईल त तहके बड़ा तेज बुखार हो गईल रहे औरी साइकिल ख़राब रहे। तब हम तहके कान्ह पर लाद के एक कोस ले गईल रहनी डॉक्टर के लगे। हम चाहेब कि तू हमके अगर एक कोस न भी त कम से कम एक मील जरूर लाद के ले चल।
इ त रहल तहरा अबोध रहला तक के ऋण। तहरा होश सम्भारला के बात के ऋण तहके भी मालूम बा। तहरा पढाई के भाग दौड़ से लेहले तहरा बियाह तक। तू ओके ऐयिमे जोड़ ल अउरी ओके लौटा द। औरी हाँ बचपन से लेके बड़ा होखे तक हमनी के कुल दस लाख रुपया तहरा ऊपर खर्चा कईले बानी जवन कि अब सूद सहित २५ लाख हो गईल। तू एके कवनो अनाथ आश्रम में दान दे दिह अउरी हमरा के रसीद भेज दिह ताकि हमरा संतोष रही। अनाथ आश्रम में पलल लईका से त केहू के कवनो उम्मीद ना नु रही। ना केहू अपना औलाद के इन्तजार में घुट घुट के मरी जईसे तहार माई मर गईली।
हाँ तहार माई अब ए दुनिया में ना रहली। पर तू चिंता जनि करिह। हम सब काम क्रिया कईला के बाद तहके इ चिठ्ठी लिखले बानी अउरी जब तहके इ चिठ्ठी मिली तब हम तहरा माई के अस्थि गंगा में बहवावत रहब”
चोख से चोख छिनी पत्थर के मान ना मटका पावेला लेकिन कब कबो शब्द चट्टान के छिन्न भिन्न क देला। बाबूजी के एके एक शब्द रवि के करेजा के चट्टान के चूर चूर क देले रहे। आखरी लाइन पढ़त पढ़त उनके आंखी से झर झर लोर बही उठल।
“what happened?” उनकर रोवाई देख सहकर्मी पूछल सन अउरी उनका मुह से बस एतना ही निकल सकल- “my mom is no more”
“हमार माई मर गईली”
एकरा बाद पूरा सेक्शन में सन्नाटा रहे। ना कवनो सवाल, ना कवनो जबाब।

 

  • धनंजय तिवारी

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