घर के मजदूर

शहर मे हम मशहूर हईं।
पर घर मे मजदूर हईं।

भोरे पांच बजे उठ जाईं।
गैस जलाईं चाय बनाईं।
मेहरारु लगे ले जाईं।
ओके जगाईं और पिआईं।
जी हजूरी करत रहीलां
हम येतना मजबूर हईं।
हम घर मे मजदूर हईं।

ओके शहरीयो मे ले जाईं।
लुग्गा आ बिख्खो कीनवाईं।
बाल्कनी मे फीलिम देखा के
चाट मिठाई ओके खिआईं।
खुश होके कहेली तब ऊ
चमन के हम अंगूर हई।
हम घर मे मजदूर हईं।

रही-रही देली गीदड़भभकी।
नइहर गईले के नित धमकी।
जौन कहेली तौन करीलां
तब्बो कहेली हमके सनकी।
जौने दिन पारा चढ जाला
कहेली हम लंगूर हईं।
हम घर मे मजदूर हईं।

हमरे सिवा उनके के झेली।
मांगेली आलू थमावेली भेली।
निशदिन नया बवाल करेली
रोजे नया ओरहना देली।
शीतकाल मे तपीलां हम
ज्यों होटल के तंदूर हई।
हम घर मे मजदूर हईं।

पतीबरता के धरम निभावें।
देंही बथ्थे त देहीं दबावें।
कहीलां चउथ के बरत न करीं
पर बरत से बाज न आवें।
कहेली हमके, हम त
उनके माथा के सेनूर हईं।
हम घर मे मजदूर हईं।
हम येतना मजबूर हईं।

  • जगदीश खेतान

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