गीत

फाटि गइल खेत
जइसे फूट-कंकरी
असों फेर पड़े झूर
झंखे गांव-नगरी।

डांड़ पड़े खाद-बीया
खेत के मजूरिया
रेट-पोत टेकटर
भाड़ा महसूलिया
धान कहे कौन
सूखे ज्वार-बजरी।असों0

आज के त नाहीं बाटे
काल्ह के फिकिरिया
बुचिया का संग के
सहेली लरकोरिया
कइसे होई जुटी कइसे
डाल – दउरी ।असों0

आधा छोंड़ चउरा मे
कुल्हिये इजतिया
हीत-नात दसमी-
देवाली डाला छठिया
किस्त फेल बैंक
मांगे लोन जबरी।असों0

–आनन्द संधिदूत

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