गीत

डार बिछुरल पतई कहली
हमहुं त डार के लगहीं रहली।
झोंका हवा के भुइयां पटकलस
फेर जहवाँ ले गइलस गईली।।

ना हमरो आपन केहु बा
ना हम बानी कुछहु अपने
संउसे डार गिरत बेरिया
फूल-पतई देखत रही गईली।।

एहन ओहन खूब घुमवलस
तोड़ मचोड़ के टुकड़ा कइलस।
फेर उड़ा के छितर-बितर करी
लेई जा के गंगा में धइली।।

गंगा हमके बहा ले गईली
जा सागर से भेंट करइली
सागर माथा लगहीं देखली
देखी निहोरा उनका कइली।।

एगो ढेला कतहीं से अइलस
हमरा के उ गले लगइलस।
टान-टून के पार उतरलस

कबहुं माटी हमरा ऊपर
कबहुं हम माटी के तर
मिली गईली ओही मटिया में
जे हमरा के जनमवली।।

  • डॉ0 रजनी रंजन

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