गरमी रे गरमी!

गरमी रे गरमी!
कतिना बेसरमी?
पानी बिन परती,
फाटि गइली धरती,
कुकुर गइले पोखरी रे, 
धइले बा बएखरी रे!

गिरगिट के पियरी,
गरई के बियरी,
पोठिया नसइली,
मरि के बसइली,
सूना बा रहतिया रे,
ठावें-ठावें घतिया रे!

दिनों भरी पछिया,
मुरुझेली गछिया,
पानी क निसानी,
भूतही कहानी,
बावरी हिरनियाँ रे,
कहेली भीलनियाँ रे!

झरल झुरल पतई,
सूख रहल लतई,
दढ़ीजर खिलंदड़,
उठेला बवंडर,
डोले बँसवरिया रे,
बजेला बँसुरिया रे!

भइँ पीछू मैनी,
काग क बेचैनी,
धाव- धूप- धूरी,
मुँह प बेनूरी,
निरलज कोइलिया रे,
बोलेली कुबोलिया रे!

  • दिनेश पाण्डेय

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