कुशिआरी

बिआह-समंध बड़ी टुनकाह चीझ ह जी! सुरुए से सइ-सइ बीपत। कबो नाइ मँझधार में नापता हो जाला त कबो कचारे में मरा जाला। ते प कुश काका जइसन करजिब्हा अदिमी गाँव में रहस त सरबनासे बूझीं। असहूँ कहल जाला कि जेकर खेत में कुशिआरी निपज जाय ओहि गिरहस्त के सात पुहुत तक अन्न के दरसन ना करि पइहें। नीसन शहतीर अस गाँव में लागल घुन रहे ककवा, जवन तरे-तरे पूरे गाँव के रेसा-रेसा भुरकुस क दिहले रहे। बतकटी, पिनुकाही, गरपराही, कुभाखन, चुगलर्इ, र्इ सभ अइसन ऐगुन-गिरोह रहीसँ जवन उनुका में कूट-कूट के ना धुरमूस के भरल रहीसँ। सभ से सरेख ऐगुन बियहकÍी के रहे जवना में काका बिसेख पटुता प्राप्त रहन।

अब देखीं ना, रमेसर तिवारी कवन बेजायँ कइले रहन जे आपन बेटा के बरतुहारी के बात छुपावे के कोर्सिस कइलें। एही निस्तानी क डरे छेंका-बरछे्या के गुपचुप आयोजन भइल। अनेसा त हइए रहे जे कुश काका के जाने भ में कवनो घरे बाजा ना बाज सके। कवनों घरभेदी कान में फुसुक गइल होखे भा अगुअन क जलखर्इ बदे रमेसर तिवारी के घर में पाकत खाँटी घिवहा हलुवा के सुबास ससर के बनाँस में आलोड़न-बिलोड़न कइले होखे, काका के कान खरहा अस अलग गइल। भोरबेरा रहे त कुश काका समै अनुसारि लतरी हाथे लोटा, कान प जनेव आ दहिना हाथ में ठेघुरी लिहले रमेसर तिवारी के दालान के अगवासा बथान प हाजिर भ गइलें। रमेसर के त साँसे अँटकल जाय। ऊपरा का मने निहँस-भाव के बिहँस के बाना धरावत बड़ी मोसकिल से बकरलें- ‘‘आर्इं आर्इं काका, अबहिएँ त राउर चरिचा होत रहे, तले ले आइए गइनीं। ढेर दिन जीअबि। अरे बचवा, तनी काका के चाह-उह लइहऽसँ रे!’’

कुश काका चश्मा के टूटही डाँटी में बान्हल फुदेनाओली रसरी के पीछे माथ के ऊपरकी छोर प घसेटत खूँटा प बान्हल बरधन क ओरि बिहंगम नजर डललें, जइसे केहू ऊँच ढिबरा प चढ़ि के नीचे चरत ढोरन के तजबिज करत होखे।

‘‘काहे रमेसर, र्इ सभ बरध तहरे हवन? कब लिहल·? र्इ बहुते आछा काम कइल·। तहरो थउँसल खेती अब ठाढ़ हो जइहें।’’ रमेसर तिवारी के बुझाइल जइसे हाथ आइल गरर्इ अब छटकले चाह·तीया। काका अवते एगो अगिनबान छोड़ि दिहले रहन। एहि बीच कुश काका निहुर के, चुक्कीमुक्की बइठ के, बरधन के आगाड़ी-पिछाड़ी बारीकी आ तन्मयता से कुछ तलाशे लगलें, जइसे पय-पातर, बार-भँवरी के गहन अनुसंधान करत होखसु। काका के नजर बेरि-बेरि बथान से उठि के दलान क ओरि छहल जाय जहाँ अगुआ आगंतुक लोग बिराजमान रहन।

‘‘का हो रमेसर, र्इहाँ सभे के?’’ फिन उत्तर के प्रतीक्षा कइले बेगर बात के रोख बदलत बरध-बखान प उतर अइलें जइसे एहि प्रश्न के कवनों बिसेख महत्व ना होखे।

‘‘बरध त बूझऽ जे एकदमें उम्दा लइले बाड़ऽ। दसकोसी में अइसन माल-मवेसी नइखन लउकत।’’

रमेसर के जान अफदरा में परल रहे, ऊ अगिनबान के तेज आँच में त अगतहीं से जरत रहन। एहि स्थिति के कइसे सम्हारस? सुनले रहन जे अगिनबान के काट बरुनबान रहे। मतलब र्इ कि कवनो चीझ झोंकारत होखे त ओ प पानी छिरिकऽ। उपाय सूझल। तुरत बिअहगर पूत क ओरि इशारा कइलें। पूत समझदार रहन, लपक के कुश काका के चरनबंदगी कइले। एहि क्रिया में काका के गोड़ के ठेसाह अँगूठा प भिनुकत माँखी से उपजल घिन के ऊ भीतरहीं दबा दिहलें आ गोड़ के नाम प ठेहुना छुवे के देखउआ मरजाद के निबाह करे के बजाय पूरा पग-परस क रीति निभावल गइल। अनीच्छा से कइल कवनो काम में, भलहीं ऊ कतिनो सावधानी से कइल जाय, कुछ-ना कुछ कसर रहिए जाला। अतिशय उमग में बबुआ थोरहन तलमलइले आ संतुलन बिगरे का ओजह से उनुकर उद्धत अँगुरी काका के घवाहिल अँगूठा में चुभ गइल। काका जहवाँ ठाढ़ रहनि तहवें असह टीस से एकटंगे छरपे लगलें। बबुआ क हाथ में कुछ पनिआह अस लभेराइल रहे त ऊ घूरि-घूरि सूँघत एकओरि लपक लिहलें। कहले जाला कि जादे धीगर लोग तीन जगे मइला मखेलें।

सुने में आवेला जे बानर एक त फेंड़ से नीचे ना धबकस आ खुदा-न-खास्ते कहीं अइसन मोंका आइओ गइल त कुछ-न-कुछ डहुँगी-पतर्इ क संगहीं गिरेलें। टभकत घाव के बेथाहुर पीर से  उछलतो-उछलतो काका आसिरवाद देवे से बाज ना अइलें। मुँह से निकसत अजस्र वाग्धार पीछे से ढेला का सकल में फेंका गइल- ‘‘नीके रह·, नीके रह· बाबू, हम त रोजे रामजी से मनावत रहीं जे तहार मिरगी छूटे आ माथे मउरि चढ़े। बहुते नीक भइल। सुन्नर बहुरिया के हाथ पीठि प परते ए तरि के बर-बेरामी त अपनहीं ठीक हो जालीसँ।’’

जाहिर बा कि बात अगुअन के कान में परल होखी। ना जाने का भइल कि ऊ लोग फरफरागित बदे गाँव से बहरिआइल त फेरु वापिस ना आइल। रमेसर तिवारी देर तक पलक-पाँवड़ा बिछइले रहि गइलें बाकी उनुका दूर-दूर ले कुशिआरी के सेवाय अउ कुछ ना लउकल।

  • दिनेश पांडेय

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