का अब सामाजिक अनुशासन के जरूरत नइखे ?

पलिवार एगो अइसन संस्था ह , जवन अनुशासन के संगे नेह – छोह आउर रिस्तन के अपने मे बन्हले आ जोगवले आगु बढ़ेला । जहवाँ आदर – सनमान  , छोट – बड़ के गियान आ समझ के सोर ढेर गहिरा से जकड़ेले , समाज के ताना – बाना के मजगुती देले । समाज के भीतरी के बुनावट के संभार के इंसानियत के रसते एक दूसरा के सहारा बने के भाव उपजावेले । एकरे चलते पलिवार के इजत समाज मे दमगर रहेला ।  आपुसी रिसता के मोल आ महातिम , एक दूसरा खाति कुछ भा सब कुछ करे क माद्दा एही संस्था से मिलेला । बाकि बीतत समय के संगे गते गते एकर संरचना टूट रहल बिया । अब कुटुंब के बात त सपना हो गइल बिया । पलिवार बिखर रहल बा आ एकल पलिवार के रूप ध रहल बा । आपुसी सम्बन्धन मे खिंचाव के चलते आ मुख्य रोजगार खेती – किसानी से ओकर रोजमर्रा के जरूरत नइखे पूरा हो पावत , ओकरे चलते नोकरी – चाकरी करे ला पलायन हो रहल बा । जवन एकल पलिवार के कारण बन रहल बा ।  जवने मे माई – बाबू आ बच्चन के छोड़ केकरो ला जगह नइखे । शहर त एकरो ले आगु जा चुकल बाड़े ।

भोजपुरिया समाज के जवन सभले बेसी सुघर परम्परा रहे , ओकरा के संयुक्त पलिवार के रूप मे जानल जात रहे । गाँवन मे अभियो थोड़ – ढेर मिलिये जाला । भोजपुरिया समाज हरमेशा से पुरुष प्रधान समाज रहल बाटे , जवने मे मालिक घर के सभले उमर दराज मनई होत रहे । समहुत (संयुक्त) पलिवार भा कुटुम मे भलही केतनो दिक्कत होखे , भलही कम खाये पहिरे के आंटत जूरत होखे भा मिलत होखे भा कवनो अउरी बात के अनदेखी होखे बाकि ओहमे मिले वाले सुख आ संतोष के सीमा नइखे । समहुत पलिवार मे बड़ – बूढ़न ला सनमान आ लगाव त रहबे करेला । काथा , कहनी से लइकन के ढेर कुछ सीखे के मिलेला । बच्चन के संगे दादा – दादी के दुलार आ देख रेख उनके अच्छा मनई बने मे लमहर सहजोग देवेला । संस्कार आ बुद्धि के विकास बड़ बूढ़ के आशीष के सुखद संजोग समाज के नीव के मजगूत बनावेला । समहुत पलिवार  दादा – दादी , चच्चा – चाची , कक्का – काकी , फूआ , भतीजा – भतीजी, ननद – भौजाई, बेटा – पतोह, भवह – भसुर , पोता – पोती  जइसन रिसतन के जियतार त रखबे करेला ओसे जुड़ावो मानेला । पलिवार के मुखिया के सभे खाति नेह छोह आ जिम्मेवारी बनेला आ उ लोग एकरा नीमन से निभइबो करेला । भोजपुरिया समाज मे संयुक्त परिवार के टूटल भोजपुरिया संस्कार आ संस्कृति से लोगन के बिसभोर क रहल बा । लोग भोजपुरी भाषा मे बोले बतियावे मे शरम महसूस क रहल बाटें भा नइखे बोलत भा इहो कहल जा सकत बा कि बोलल भुला गइल बाटें । एकर मतलब त इहे नु भइल कि अइसन लोग अपने संस्कार आ संस्कृति से दूर हो गइल ।

बिआह एगो अइसन रिसता ह , जवन पलिवार के जोड़ के राखेला । एहमे दो गो कुल – खानदान के संस्कार समाहित रहेलें । आजू काल्हु के शिक्षा आ पछिमी लौछार के चलते अब शहरन के नवहा बिआह से दूरी बना रहल बाड़े ।  लइका भा लइकी अब कवनों तरह के रोक छेक के ना मानेलन । उनुका हिसाब से उनके स्वतन्त्रता पर पलिवार के आंकुस सहे जोग नइखे ।  दुनिया के ओरी झांकल जाउ त सभे कुछ सोझा आ साफ लउके लागी । संयुक्त राष्ट्र के एगो रिपोट क़हत बिया कि 25 गो अइसन देश बाड़े जहवाँ 60% लइका बिना बिआह के हो रहल बाड़े । यूरोप , अमेरिका आ दखिन अमेरिका मे लोग बिआह के जरूरी ना मानेला । ब्रिटेन मे 50% लइका बिना बिआह के हो रहल बाड़े । चिली , कोस्टारिका आउर मेसिक्कों मे 65 % लइका बिना बिआह के हो रहल बाड़े , जेकर भरण पोसन के जिम्मा मेहरारून पर बा । अइसन स्थिति मे बच्चन के विकास नीमन से ना हो पावेला काहें से कि उनुकर नीमन से  देख रेख अकेल मेहरारू ना क पावेली सन ।

एकर लुत्ती अब गवें गवें भारतों मे गोड़ पसार रहल बा । शहरी पढ़ल लिखल आ नीमन नोकरी करे वाला नवहा एकरा ओरी जा रहल बाड़े । एह समाज से कुछ लोग उनुका सहजोग क रहल बाड़ें , जवन भारतीय संस्कृति आ संस्कार ला घातक बा । कबों – कबों एकल पलिवार वाला लोग ढेर – थोड़ संयुक्त पलिवार के कमी महसूसे लागल बाड़ें । अकेलापन हरमेसा असुरक्षा आ तनाव के बीमारी के लमहर ठीहा होला । जवने एकल पलिवार मे मरद मेहरारू दूनों नोकरी क रहल बाड़े उहवाँ छोट लइकन के नीमन से देख रेख नइखे हो पावत । एकरा चलते लइकन मे चिड़चिड़ापन आ  जिद्द घर क रहल बा । नाता रिसता से उनके कवनो लगाव ना रह गयल बा । ई सब समाजिक बनावट के नोकसान पहुंचा रहल बा । शहर दर शहर  बढ़त बृद्ध आश्रम के वोजह इहे बा । पलिवार के बिखराव आ अपने बड़ बुजुर्ग के अनदेखी समाज बदे ठीक नइखे । शायद अब के समाज बदे इ जरूरी बा कि पढ़ल लिखल लोग एकरा बिषय मे नीमन सोच बना के घर के बड़ बुजुरगन के मान – सनमान आ अपनापन  देसु । एह कुच कुच अन्हरिया मे कतों – कतों सनकिरवा बरत देखाने त मन बड़ा सकून मिलेला ।

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

 

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