कइसे बसी बसंत बनारस में

‘ गुरु ! बसन्त पंचमियो बीत गयल बाकिर एना पारी कवनो बसंत क राग-रंग नइखे जनात।फेड़ -फुनगी, फूल पत्ता धूर से अटल बाटे।कोइलियो ना बोलले अब त।का हो साह जी तोहार त सठवां बसंत लग गयल होई। कि ना? ‘ साह जी खदकत -फफात चाय क भगोना उतारे खातिर सँडसी खोजत रहलन बाकिर कहीं देखात ना रहे।ए कुल में ऊ एतना अफनायल रहलन कि उनके नन्हकू क बात मरिचा जस तीत लगत रहे। तीताई नन्हकू भांप गयल रहलन अउरी अब केहू दोसरे से बतकुच्चन करे खातिर छटपटाये लगलन।
‘का ए गुरु तोँही बतावा बसंत क आहट तनियो-मनी सुनात ह।’ जेसे सवाल पूछल गयल ऊ ना में मूड़ी हिलवलस ।
‘ अच्छा हम जानल चाहत हईं रउवा लोगन क बसंत के बारे में का जानकारी बाटे।काहें से कि ई चर्चा काशी क अड़ीये पर ना होई त कहाँ होई जी।साहित्य, राजनीत से लेके कला-संस्कृति पर काशी क अड़ी अपने चाय प चर्चा खातिर देस-बिदेस में सरनाम ह।ये गुरु कहा कि झूठ कहत हईं ?’नन्हकू खोद -खोद के सबसे पूछ भइलन बाकिर केहू ए मुद्दा पर कुछ बोलबे ना करे।
‘नत बोले केहू बाकिर हम जानीला बसंत काहें खातिर आवेला।जब बसंत आवेला त कन-कन में सुबास-सुघरई अउर हुलास भर जाला।अंग -अंग में अनंग रच-बस जालन..अउरी-अउरी।’ नन्हकू कविताई करे के मूड में रहलन बाकिर गुरु क जोरदार ठहाका से अचकचा गइलन।
‘ए बचवा तुंही सुनत होइबा बसंत क आहट बाकिर हमहन के अब त काशी में एक्के गो आहट सुनाला।ओके सुनते काशी सजे-सँवरे लागेले।नाली-नाला, गली-कूचा धोआये-पोछाए लागेला।शासन-प्रशासन सांसत में पड़ जाला।स्वागत में कपालभाति करत बड़-बड़ जाना क थरहा डोल जाला।सड़किया कुल अलकतरा पिए लगेलीं सं ।रात -बिरात ले एतना गिट्टी एहन के पेट में ठूंसा देवल जाला कि हप्ता बीतत-बीतत पेट फाट -फूट के बरोब्बर।बानर-साँड़, कुक्कुर-बिलार सबही ओ घरी जान जाला कि अब बन्हाये-छनाये क बारी आ गयल ह।रूट-डायवरजन कह के जवन खेदा -खेदी मचेला कि पब्लिक एक्के दिन में बेकल होके हाय-हाय करे लगेले।ई आहट कब -कब होले तू त जनबे करत होइबा न भगत बबुआ ?’ गुरु नन्हकू ओरी बान पर बान छोड़त रहलन बाकिर नन्हकू सजग रहलन।
‘ कह ला लोग कह ला बाकिर ई जान जा लोग कि सरपले से अउरी लंगड़ी मरले से केहूए क भला ना होई।सुशासन खातिर सबही के सहयोग करे के परी दुस्सासन बनले से काम ना चली।सबही चीर लूटे में अउरी हंसी-ठट्ठा करे में मगन बा।बनारस क रस चूसे में तोहनो लोग केहू से कम नइखा जा।राम जाने कइसे आई अब बसंत बनारस में।’ नन्हकू के बेचैन बड़बड़ाहट पर केहू कान ना धरे। सब  उनके लो-लो करत पिछुअवले रहल अउर ऊ ‘अच्छे दिन’ नियन सबसे दूर हाकल-पियासल भागत चलल चल जात रहलन।

डॉ सुमन सिंह

वाराणसी

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