उघार होत बेरा चिल्ल पों काहें —?

का जमाना आ गयो भाया ,सगरो उंगरी उठे लागल बा । जे लमहर फरीछ बनके डोलत रहल ह ,ओकरे उजरकी धोतिया पर छिटकी पड़ल देखात बा । कतनों टह टह बरत होखे धोतिया ,छिंटकिया त चमकिए जाले , छिपे ना । अचके ई छिंटकिया आइल कहाँ से , ई अभियो एगो रहस्य बा । का अबले तोपल ढांकल रहल हे भा ई टटका पड़ल हे  , एकरो खोजबीन होखही के चाही । बाकि खोजबीन करी के , जे जे करे वाला बा , उ सभे कनई मे सउनाइल बा । अब कतनों जा के गंगा नहाय , न कनइये छुटत बिया , ना धोतिए फेर से उज्जर होखे वाली बिया । करइल के करियवा मटिया एक बेर चिपक जाले, फेर हाली छूटेले ना । धोवत – धोवत जुग लगि जाला , तब जाके जरी – मनी मद्धिम होखेला । फेर अब धोवत रही आ पेवना पोवत रहीं ।

फेर सुनाता कि एगो अजबे बेमारी आइल बिया , कुछ लोग कहे लागल बा कि उ करइल वाली मटिया हमरे रहल ह , भलही ओकरा के केकरो खेत से निकार के लियावल गइल होखे । ओकर पेटेंट त हमरे नावें ह । हमरे मटिया सगरों छिटाइल बा , हमरे कहाई । केहू जबरी कुछू बूझो , एह मटिया के चरचा त हमरे से बा । हम ना रहित त एह मटिया के केहू न जान पवले रहत । एह मटिया के हम कहाँ कहाँ ना ले गइली ।

भगेलू चच्चा  ठीके क़हत रहलें कि जबले फुंसिया फोड़ा बनिके बथे ना लागे , तबले डागदर के लग्गे भला के जायल चाहेला । अब जब फोड़ा हो गइला पर डागदर के लग्गे केहू जाई , त डागदर बेचारा चीर – फाड़ करबे नु करी । फेर अब मइया बप्पा काहें नरियात बाड़ें । जब चीर फाड़ होखी त खून आ मवाद त निकलबे करी । अब काहें घिन बरत ह भाई , फुंसी के फोड़ा बनावत बेर सोचे के चाहत रहे । ढेर दिन से लोग भरम के बदरी मे तोपाइल, कुइयाँ के बेंग लेखा अपने के बरियार पंवरे वाला बूझत रहल ह , अब उघार होत बेरा कइसन चिल्ल पों ।

“घरे भूँजी भाँग नाही , माई चललिन भरसाईं” वाली बतिया त हमनी लइकइये से सुन रहल बानी स । अब त देखहूँ के मिले लागल । अबहियों ढेर लोग भेंटला जेकर मंतर “जेकर लेहली कबों ना देहली , राउर लेके काहें पराईब , एजुगे बइठ मलाई खाइब” इहे बा । ई उहे लोग ह जेकरे घरे मुँह धोवेला पनियों मयस्सर ना होला , उहो बरतुहारी मे गइला पर मसहरिये पर बइठ के नहाये के जोहेला आ देह पोछेला मखमल के संगे नोकर । मसलन्द से कम पर बइठल ओके आपन बेइजती बुझाला ।

इहे कूल्हि सोचत बगेदना माने मन बड़बड़ात, मुड़ी गोतले चलते चलत भगेलू चच्चा से टकरा गइल ।

‘अन्हरा गइल बाड़े का रे बगेदना’ , देख के ना चल सकेले । दिन अछते टकरात चलत बाड़े ।

नाही हो भगेलु चच्चा , आज भोरही से मगज खराब भइल बा । मनईन के उलटा सीधा जवन रहन हो गइल बा , उहे कूल्हि सोचत रहनी ह ।

अरे बुड़बक ! तोरा के इ कवन रोग धराईल रे । इ रोगवा सोझबाग लोग के ना होखे के चाही । पहिले से इ रोग त मुखौटा लगावे वालन के होत रहे । तोरा कइसे हो गइल ?

हमरा के कवनो रोग नईखे भगेलू चच्चा ! ढेर दिन से सुनत सुनत आज ना रह गइल ह । हमार मगज मराइल नइखे कि हम एह खचेडुवन के चक्कर मे पड़ी । इ कूल्हे आपन चेहरा चमकावे के फेरा मे रहेलन । आपन दुकान दौरी चलावे के फेरा मे रहेलन । एहनी के एकही गो सिद्धान्त बा – “बनल रहे जजमान चकाचक” आ बर मुवे चाहे कनिया , दक्षिना से काम !

नीमन बुझले बचवा ! इ क़हत भगेलू चच्चा आगु खाति निकल लीहने ।

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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