अपने से अपने लोग हारेला हो

भरोशा ना करिह केहू पs कबो,
बीच रहियें में जान लोग मारेला हो।

बन के आपन देखा के मासूमियत,
करेला घात दुश्मनी काढ़ेला हो।

कुदरत के लिखल लेख केहू मिटा ना सके,
ना त केहू ओकरा के टारेला हो।

होनी होके रही लाख कोशिश कलs,
अनहोनी से काहें लोग डरेला हो।

कहें के सभ आपन केहू आपन ना होला,
बोले के बड़ बड़ मुँह फारेला हो।

एतने ले पेयार मोहब्बत रह गईल बा,
मरला के बाद माँटी में गाड़ेला हो।

देखत रहेला लोग हँवा के रोख,
तबे बुतल दिया के बारेला हो।

मन के मिलेला शान्ति देख के दूसरा के बैचैनी,
अपना पs परे तs लोर ढ़ारेला हो।

का केकरा से कहि केंहू सुनत ना बा,
बोलेला अस जीव जारेला हो।

जमाना से लड़ के जंग जीतल जा सकेला,पर
अपने से अपने लोग हारेला हो।

– दीपक तिवारी
श्रीकरपुर,
सिवान

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